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राजस्थान : जमीन, फ़सल और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के कारपोरेट्स के मंसूबों के खिलाफ़ किसानों के संघर्ष जारी
सन् 2014 में राजस्थान और फिर केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से ही भाजपा-आरएसएस अपने कार्पोरेट आकाओं को किसानों की जमीन छीन कर सौंपने के लिये बुरी तरह से छटपटा रही है।
पहले राज्य में तत्कालीन भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार द्वारा और उसके बाद केन्द्र में मोदी सरकार द्वारा लाये गये भूमि अधिग्रहण विधेयक उसी छटपटाहट की अभिव्यक्ति थी। परंतु पहले प्रदेश और फिर देश में किसानों के सशक्त विरोध के कारण भाजपा-आरएसएस और उसके आकाओं के मंसूबे कामयाब नही हो पाये और उन्हें अपने कदम वापस पीछे खींचने पड़े। लेकिन देशी-विदेशी कार्पोरेट्स घरानों की प्राकृतिक संसाधनों को कब्ज़ा कर अपने मुनाफों को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने की लालसा बढ़ती ही जा रही है।वे किसानों और आम जनता के संघर्षों से सबक लेने और पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।इसके लिये केंद्र और राज्यों की सत्ता में अपने इशारों पर काम करने वाली पूंजीवादी पार्टियों और नेताओं को बैठाने के लिये हर हथकंडे अपना रही हैं।
भूमि हड़पने के कानून को बनाने में विफल रहने के बाद अलग-अलग तरीके से किसानों की ज़मीन, उत्पादन और संसाधनों को छीनने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाये जा रहे हैं।लैंड पूलिंग कानून ,किसानों से अलग-अलग जमीनें छीनने के लिये प्रशासन और सरकारी मशीनरी को इस्तेमाल किया जा रहा है। राजस्थान में सोलर एनर्जी के क्षेत्र में भारी मुनाफा कमाने की संभावना को देखते हुए पश्चिम राजस्थान के इलाकों में अडानी,अंबानी आदि कम्पनियों ने बिजली उत्पादन के संयंत्र लगाये हैं।
परंतु इन संयंत्रों की स्थापना और इन संयंत्रों में बनाई जा रही बिजली को बेचने के लिये देश के दूसरे हिस्सों में बेचने के लिए किसानों से जमीन लेने को आतुर हैं किन्तु सन् 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से भूमि लेने के लिये ग्राम सभा की स्वीकृति, बाजार भाव का चार गुना मुआवजा और स्थानीय लोगों को रोजगार देने आदि शर्तें उन्हें मंजूर नहीं हैं। अतः सरकार ने उनके लिए रास्ता निकालते हुए स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन को किसानों से व्यक्तिगत रूप जमीन लेने को अधिकृत कर दिया।
इसके तहत प्रशासन ने किसानों को बिना पूरी तरह से जानकारी दिए और प्रशासन का भय दिखाकर मुफ्त में अथवा औने-पौने दामों में किसानों के खेतों पर बड़े बड़े भीमकाय विद्युत ट्रांसमिशन टावर लगा दिये। टावर के नीचे और उसके आसपास की पूरी जमीन किसान के लिये अनुपयोगी हो गई और उसको अपनी जमीन का कोई मुआवजा नहीं दिया गया। क्योंकि प्रशासन ने उसे बताया ही नहीं कि मुआवजा का क्या प्रावधान है।
अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में जब नागौर, डीडवाना-कुचामन, बीकानेर, सीकर और झुंझुनूं में किसानों ने इस जमीन की लूट का सशक्त विरोध किया और कम्पनियों का काम बंद कर अपने खेतों से रास्ता देने से इंकार कर दिया तब जाकर ये खुलासा हुआ कि जिला प्रशासन को मुआवजा तय करने का अधिकार है।
इसके लिए इन जिलों में किसानों ने ट्रांसमिशन टावर लगाने के काम को ठप्प करने से लेकर टावरों को उखाड़ फेंकने के साथ ही प्रशासन को चेतावनी दी कि जब तक पूरा मुआवजा नहीं मिलेगा उनको एक इंच भी जमीन नहीं दी जायेगी और खेतों में घुसने नहीं दिया जायेगा।
इसके अलावा गांव,तहसील और जिला स्तर पर किसानों क प्रदर्शन के बाद प्रशासन से वार्ता में यह सामने आया कि जमीन के साथ ही साथ फसलों, पेड़-पौधों और पशुओं की संख्या के लिये भी मुआवजा दिया जा सकता है। उसके लिये भी किसानों जागरूक होकर लड़ना पड़ा वर्ना सरकार किसान को कुछ भी नहीं देना नहीं चाहती थी।किसानों के संघर्षों के बाद ही अलग-अलग किसानों को अपनी जमीन का अलग-अलग करोड़ों रुपए का मुआवजा मिला। इस तरह किसानों की जमीन को मुफ्त में हड़पने के सरकार और कार्पोरेट्स के मंसूबों को किसानों की एकता और संघर्ष ने एक बार फिर विफल कर दिया।
किसान सभा के संघर्षों की वजह से डीडवाना-कुचामन, सीकर, झुंझुनूं, बीकानेर जिलों कई किसानों को एक बीघा के बीस-तीस लाख तक का मुआवजा मिला है जबकि उससे पहले किसानों की ज़मीन को मुफ्त में या कुछ हजार रुपए का मुआवजा देकर लिया जा रहा था। अभी भी जिन इलाकों में किसानों का आंदोलन नहीं है वहां पर किसानों की ज़मीन को मुफ्त में या औने-पौने दाम पर छीना जा रहा है। भविष्य में इस लूट के खिलाफ़ अखिल भारतीय किसान सभा राज्यव्यापी आंदोलन की तैयारी कर रही है।
फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीद के लिये संघर्ष:-
एक तरफ केंद्र सरकार द्वारा फसलों के समर्थन मूल्य की घोषणा के लिये सी-2+ 50% फार्मूला को आधार नहीं बना कर किसानों को प्रति क्विंटल हजारों रुपए का नुक़सान पहुंचाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस घोषित समर्थन मूल्य पर भी समय पर खरीद शुरू नहीं करके और दूसरे अनेक तरीकों से किसानों की उपज को सस्ते भावों पर बेचने के लिए मजबूर करने का खेल किया जाता है। समय पर खरीद केंद्र में सरकारी खरीद शुरू करने, बारदान उपलब्ध करवाने और खरीद में तरह तरह की किसान विरोधी शर्तें लगाने के खिलाफ़ श्रीगंगानगर, अनूपगढ़, सीकर, झुंझुनूं, कोटा और हनुमानगढ़ आदि जिलों में आंदोलन और धरना प्रदर्शन किये गये और किसानों की अधिकतम फसलों की समर्थन पर खरीद को मजबूर किया गया।
हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर-अनूपगढ़ में तहसील मुख्यालयों विरोध प्रदर्शनों के बाद जिला कलेक्ट्रेट पर पर प्रदर्शन किये गये जिनमें हजारों की संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया।
किसान सभा द्वारा स्वतंत्र रूप से भी और संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले सामूहिक रूप से भी आंदोलनों का नेतृत्व किया गया।
फसलों के बीमा क्लेम को लेकर आंदोलन :-
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के नाम पर बीमा कंपनियों की लूट बदस्तूर जारी है और इस लूट में कंपनियों को सरकारों का पूरा संरक्षण, सहयोग और समर्थन प्राप्त है।इस लूट के खिलाफ़ पूरे चूरू जिले और हनुमानगढ़ जिले की कुछ तहसीलों में लगातार संघर्षों की वजह से किसानों को अरबों रुपए का मुआवजा मिला है। इस बार भी आंदोलन के दबाव में पिछले बकाया बीमा क्लेम किसानों के खाते में आने शुरू हो गये हैं।
पेयजल संकट के खिलाफ़ आंदोलन :-
राज्य कई इलाकों में पीने के पानी को लेकर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। एक पर्याप्त बरसात नहीं होने और भूजल स्तर नीचे चले जाने की वजह से अधिकांश हिस्सा डार्क जोन घोषित हो चुका है। खेती-किसानी तो दूर की बात पशुओं और मनुष्यों के पीने के लिए भी पर्याप्त शुद्ध पानी उपलब्ध नही है। राज्य सरकार का ध्यान केवल बड़े महानगरों और उनकी पोश कालोनियों की चिंता करने तक सीमित है। नदी जल समझौतों में राज्य को मिलने वाले हिस्से का पानी लेने में राज्य सरकार में इच्छा शक्ति की कमी और राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी बाधक है। शुद्ध पेयजल आपूर्ति और राज्य के हिस्से का पूरा पानी लाकर जनता को पीने और किसानों को खेती सिंचाई के लिये पानी उपलब्ध कराने की मांग को सीकर, झुंझुनूं, जयपुर ज़िलों में आंदोलन चल रहे हैं।
यमुना जल में राजस्थान के हिस्से का पानी लाकर शेखावाटी और दूसरे इलाकों को देने के लिए नहर बनाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो रहा है। झुंझुनूं में एक साल से ज्यादा समय से लगातार धरना और आंदोलन जारी है। सीकर में जिला कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया गया जिसमें भारी संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया।
स्मार्ट मीटर लगाने और बिजली के निजीकरण के ख़िलाफ़:-
स्मार्ट मीटर लगाने और बिजली के निजीकरण के ख़िलाफ़ राज्य भर में और खासतौर पर हनुमानगढ़ जिले में लगातार संयुक्त आंदोलनात्मक गतिविधियां जारी है। इनमें अखिल भारतीय किसान सभा सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
ग्रामीण रोज़गार गारंटी के लिये संघर्ष:-
बीवी ग्रामजी योजना को वापस कर मनरेगा को वापस चालू करने और गांव-गांव में मनरेगा का काम शुरू करके किसानों को रोजगार देने की मांग को लेकर अनूपगढ़ जिला और हनुमानगढ़ जिले के कुछ हिस्सों में सुनियोजित अभियान और आंदोलन चलाये गये हैं जो कि लगातार जारी हैं।