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तीसरा पी. सुंदरैया स्मृति व्याख्यान में बोले के.एन. गणेश
तीसरा पी. सुंदरैया स्मारक व्याख्यान प्रसिद्ध इतिहासकार और केरल ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर के.एन. गणेश द्वारा 26 मई 2026 को नई दिल्ली में “साम्राज्यवाद और कृषि का सवाल: वामपंथी आंदोलन की संभावनाएं” विषय पर दिया गया। अपने विस्तृत प्रस्तुतीकरण में, के.एन. गणेश ने संगठित वामपंथ के दृष्टिकोण से कृषि से जुड़े प्रश्न के विकास का एक ऐतिहासिक और राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। साम्राज्यवाद पर लेनिन के फॉर्मूले के वैज्ञानिक महत्व को दोहराते हुए, गणेश ने रेखांकित किया कि क्रांतिकारी रणनीतियाँ तैयार करने के लिए वित्त पूंजी की चालों को समझना बेहद जरूरी है।
गणेश ने बताया कि कैसे आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान नव-फासीवादी व्यवस्था यूपीए प्रथम सरकार के दौरान शुरू किए गए “सीमित राहत उपायों” को व्यवस्थित रूप से खत्म कर रही है। “ग्रामीण क्षेत्रों की तेजी से होती गिरावट, कामकाजी आम जनता की गरीबी और कंगाली को बढ़ाने के साथ-साथ, पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी की स्थिति पैदा होने का भी खतरा पैदा करती है।” संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के नेतृत्व में हुए दिल्ली के ऐतिहासिक किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस आंदोलन के कॉर्पोरेट-विरोधी पहलू “अत्यंत आशाजनक” थे। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि “यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने कृषि से जुड़े सवाल के उन सभी पहलुओं को संबोधित और शामिल किया है, जो आज सामने आ रहे हैं।”

कृषि प्रश्न की वर्तमान चुनौतियों को सामने रखते हुए गणेश ने तर्क दिया कि “भारत में वामपंथ विकास सुनिश्चित करने के लिए पूंजीवादी विकास और कामकाजी जनता को नियंत्रित रखने की उसी रणनीति का पालन नहीं कर सकता, क्योंकि इन्हीं रणनीतियों का उपयोग खुद शासक वर्ग द्वारा किया जा रहा है।” उन्होंने सिद्धांत दिया कि किसान और मजदूर वर्ग के “प्रतिरोध का उद्देश्य पूंजीवादी विकास की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विपरीत, उत्पादक शक्तियों के रूप में कामकाजी जनता के विकास में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से निष्क्रियता को समाप्त करना होना चाहिए।”
गणेश ने कहा कि, एक क्रांतिकारी और सार्थक विकल्प विकसित करने के लिए, लोगों को “सहकारिता” पर लेनिन के सैद्धांतिक फॉर्मूलों पर वापस जाना चाहिए। “हमें यह भी समझना चाहिए कि साम्राज्यवाद और कॉर्पोरेट पूंजीवाद के खिलाफ लड़ाई पूंजीवादी विकास के रास्ते आगे नहीं बढ़ सकती, जिसे मूल रूप से सामंतवाद के खिलाफ लड़ने की रणनीति के रूप में सोचा गया था। वामपंथी ताकतें कामकाजी वर्गों के दृष्टिकोण से रणनीतियों में इन बदलावों का आलोचनात्मक विश्लेषण करने और रचनात्मक एवं अभिनव मोर्चेबंदी (वॉर ऑफ पोजीशन) विकसित करने में असमर्थ रही हैं।”
इस व्याख्यान में किसान कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, छात्रों और शिक्षकों की एक बड़ी संख्या शामिल रही। व्याख्यान के बाद एक जीवंत प्रश्नोत्तर सत्र भी हुआ। पी. सुंदरैया मेमोरियल ट्रस्ट के ट्रस्टी अशोक ढ़वले, विजू कृष्णन, हन्नान मौल्ला और पी. कृष्णप्रसाद भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।