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गन्ना कानून के मसविदे की वापसी, अब आगे क्या होगा ?
भाजपानीत केन्द्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 29 मई, 2026 को जारी अपने कार्यालय ज्ञापन में घोषणा की, कि “राज्य सरकारों तथा अन्य हितधारकों से प्राप्त सुझावों एवं टिप्पणियों के आधार पर गन्ना (नियन्त्रण) आदेश, 2026 के मसविदे पर पुनर्विचार आवश्यक समझा गया है, और इसी के अनुरूप इस मसविदे को वापस ले लिया गया है।” सरकार द्वारा 20 अप्रैल, 2026 को जारी किये गये मसविदे पर 20 मई, 2026 तक हितधारकों से सुझाव व टिप्पणियाँ मांगी गई थीं। अखिल भारतीय गन्ना किसान महासंघ (ए आइ एस एफ एफ) ने भी यह रेखांकित करते हुए कि मसविदा, गन्ना किसानों की कीमत पर निजी कारपोरेट चीनी उद्योग और उसके द्वारा इथनाल उत्पादन को बढ़ाने और खपाने की सरकार की तेजी से आगे बढ़ाई जा रही नीति को कानूनी आधार प्रदान कर उनके मुनाफों को अधिकतम करने के लिए लाया गया था, इसे वापस लिए जाने की मांग की। सरकार ने स्पष्ट किया था कि गन्ना (नियन्त्रण) आदेश, 1966 के स्थान पर, गन्ना (नियन्त्रण) आदेश, 2026 का मसविदा वह इसलिए लेकर आयी क्योंकि प्रोद्योगिकीय और अन्य तरक्की के चलते चीनी क्षेत्र में भारी बदलाव आये हैं।
निजी कारपोरेट का हितसाधन
इस मसविदे को चीनी क्षेत्र में आये “बदलावों को मुख्य आधार बनाते हुए निजी कारपोरेट संस्थाओं के हितों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। मसविदे में, देश भर की सहकारी चीनी मिलों के संरक्षण और विकास के लिए कोई प्रावधान नहीं था। इसमें स्वामीनाथन आयोग के सी2+50 प्रतिशत के फार्मूले के आधार पर गन्ने का मूल्य निर्धारित करने के बारे में चुप्पी साध ली गई थी और इस बारे में किसी ‘बदलाव’ को नकारते हुए, गन्ने के मूल्य निर्धारण के लिए रिकवरी रेट को 9.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10.25 प्रतिशत का किसान विरोधी प्रावधान किया गया था। इसमें गन्ने के मूल्य को सीधे चीनी की कीमतों से जोड़ते हुए यह व्यवस्था की गई कि यदि चीनी मिलों को वित्तीय घाटा होता है तो राज्य सरकार की अनुमति से गन्ने के मूल्य में कटौती की जा सकती है। इसमें दो गन्ना मिलों के बीच की न्यूनतम दूरी को 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव किया गया जो किसानों के विकल्प को सीमित कर मिलों के एकाधिकार को स्थापित करेगा। चीनी मिलों पर किसानों के बकाये की समस्या बराबर गंभीर बनी हुई है, और यह हैरान करने वाला है कि इस विकट समस्या के समाधान के लिए प्रस्तावित कानून में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा गया। 1966 के गन्ना (नियन्त्रण) आदेश के प्रावधानों को ही नये प्रस्ताव में आगे बढ़ा दिया गया। स्पष्ट है कि इस स्थिति की कोई समीक्षा भी प्रस्तुत नहीं की गई।
किसानों की अनदेखी
वापस लिये गये मसविदे में इथनाल आधारित चीनी उद्योग को बढावा देने के लिए इथनाल उत्पादन को तो नये गन्ना कानून में समाहित करने पर पूरा जोर लगाया गया लेकिन, इसमें गन्ना किसानों एवं गन्ने की खेती से जुड़े मज़दूरों की पूरी अनदेखी की गई, जबकि वे चीनी क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक हितधारक हैं। यह समझ पाना मुश्किल है कि इस आदेश की जरूरत पैदा करने वाले, ‘गन्ना क्षेत्र में आये बहुआयामी बदलावों ने गन्ना किसानों को क्यों नहीं प्रभावित किया? प्रश्न यह है कि जब इथनाल व अन्य सह-उत्पादों के उत्पादन व मूल्य में वृद्धि से निजी कॉरपोरेट कंपनियों को भारी लाभ मिलेगा तो गन्नाकिसानों को उसका उचित हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिये? सरकार इस ज्वलंत सवाल से क्यों बचना चाहती है? दरअसल, सरकार ने चीनी क्षेत्र में आये जिन बदलावों की बात की है उनका खुलासा यह है कि नई टेक्नोलॉजी ने चीनी उद्योग में चीनी के सह-उत्पादों की संख्या को बहुत बढ़ा दिया है। इसका मतलब जितने ज्यादा सह-उत्पाद उतना ज्यादा मुनाफा। मसविदे में यह भी सामने आ गया कि इथनाल के उत्पादन के लिए चीनी और शीरे का उत्पादन करना जरूरी नहीं, चीनी के उत्पादन को बाईपास कर गन्ने के रस को ही सीधे प्रयोग में ले लिया जायेगा। बिजली और उर्वरक उत्पादन भी सह-उत्पादनों की सूची का हिस्सा हैं। समझने की बात यह है कि जहां चीनी उद्योग के लाभ के लिए इस सबको गन्ना (नियन्त्रण) आदेश 2026 में कानूनी दायरे में ले आने पर इतना जोर दिया गया है वहीं लाखों गन्ना उत्पादक किसानों को सी 2+50 प्रतिशत के आधार पर एफ आर पी का भी अधिकारी नहीं माना जा रहा। अभी तक तो यही नहीं हो पाया। इसके आगे सह-उत्पादों से होने वाले मुनाफों में गन्ना किसानों को हिस्सेदारी का बड़ा सवाल भी है।
खांडसारी इकाईयों को मसविदे के प्रावधानों में बहुत ही उलझाकर रखा गया है। सामने आये प्रावधानों में जहां उनसे किसानों को एक आर पी देने की बात कही गई है वहीं उन पर ऐसा शिकंजा कसने की योजना है जिससे उनके बने रहने पर ही संकट आ जाये। एक अनुमान के मुताबिक कुल उत्पादित गन्ने का लगभग 30 प्रतिशत छोटी व मध्यम खाडसारी इकाईयों में जाता है। इसमें किसानों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गन्ना किसान ही छोटे कोल्हुओं व खांडसारी इकाईयों के मालिक व संचालक हैं।
अब आगे क्या होगा ? जरूरत तो किसान केन्द्रित गन्ना (नियन्त्रण) आदेश की ही
केन्द्र सरकार गन्ना किसानों व उनके संगठनों से चर्चा किये बिना ही जिस तेजी से 1966 के आदेश के स्थान पर गन्ना (नियन्त्रण) आदेश, 2026 का मसविदा लेकर आयी उससे लगा था कि वह अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले नये शुगर सीजन में ही इसे लागू करेगी। परन्तु, गन्ना किसानों द्वारा इसे खारिज किये जाने और आंदोलन की चेतावनियों के बाद सरकार को इसे वापस लेने के लिए मजबूर होना पडा। देशभर में किसानों के लिए यह एक फौरी राहत की तरह है जिसमें सरकार ने बस कदम पीछे हटाया है, वह रास्ते से नहीं हटी है। उसकी कारपोरेट परस्त और किसान विरोधी नीतियों में कहीं कोई बदलाव नहीं हुआ है। फिलहाल उसने जिस तरह मसविदे को वापस लिया है उसमें किसानों द्वारा दर्ज कराये गये कड़े विरोध के अलावा अन्य कारण भी हो सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख, उत्तरप्रदेश में अगले वर्ष की पहली तिमाही में होने वाला विधान सभा चुनाव हैं जहां गन्ने का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है। केन्द्र सरकार गेंद अपने पाले में रखना चाहती है। वह हमेशा की तरह सहीं अवसर की ताक में रहेगी। मसविदे को वापस लिये जाने के बाद जाहिर है कि गन्ना (नियन्त्रण) आदेश 1966 प्रभावी रहेगा। इस सरकार के खुलेआम कारपोरेट के पक्ष में खड़े होने और किसानों के हितों पर चोट करने के रिकार्ड को देखते हुए देश भर के गन्ना किसानों को कभी भी आने वाले हमले का सामना कर उसे विफल करने के लिए और एक गन्ना किसान (नियन्त्रण) आदेश के लिए सरकार को बाध्य करने के लिए तैयार रहना होगा।