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शोषण से मुक्ति के लिए संगठन एक हथियार

शोषण से मुक्ति के लिए संगठन एक हथियार

11 अप्रैल 2026 को अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के अस्तित्व के 90 वर्ष पूरे हुए हैं। 30–31 जनवरी 2026 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुई एआईकेएस की बैठक ने यह निर्णय लिया कि इस अवसर पर 11 अप्रैल 2026 से 10 अप्रैल 2027 तक वर्षभर कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे, जिनमें सभी सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए एक सुदृढ़ संगठन का निर्माण किया जाएगा, ताकि कृषि क्रांति के लक्ष्य को साकार किया जा सके।

गुंटूर में 31 जनवरी–1 फरवरी 2026 को पिछले 90 वर्षों में पहली बार “संगठन पर कन्वेंशन” आयोजित किया गया, जिसमें संगठन संबंधी एक व्यापक प्रस्ताव पारित किया गया। इसका निर्णय 2013 में तमिलनाडु के कुड्डालोर में आयोजित 33वें सम्मेलन में लिया गया था। जब मेहनतकश जनता के कठिन संघर्षों से अर्जित सभी अधिकारों पर हमला हो रहा है और कॉरपोरेट लूट को अधिकतम करने के लिए जनता पर नव-फासीवादी, विभाजनकारी आक्रमण तेज हो रहा है, तब देशभर के किसानों को ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो इन हमलों का प्रभावी प्रतिरोध कर सके और एक वैकल्पिक दिशा प्रस्तुत कर सके। यह लेख किसान सभा द्वारा गुंटूर में पारित इस प्रस्ताव की मुख्य विशेषताओं पर विचार करता है।

प्रस्ताव में संगठन के बारे में यह विचार स्पष्ट रूप से रखा गया है कि “सबसे उत्तम सिद्धांत और ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण भी तब तक कोई परिवर्तन नहीं ला सकते, जब तक उनके साथ एक सशक्त संगठन न हो, जिसका जनसमुदाय से जीवंत संपर्क हो और जो ऐसे सिद्धांतों को व्यवहार में उतार सके तथा ठोस विश्लेषण के आधार पर सही निर्णयों को लागू कर सके।” आगे यह भी रेखांकित किया गया है कि “शासक वर्ग की नीतियों, सामंती मूल्यों और शोषण के खिलाफ संघर्ष में संगठन किसानों का मुख्य हथियार है।”

दस्तावेज़ ने कृषि संकट और किसानों पर हो रहे हमलों से निपटने में वर्गीय दृष्टिकोण को सही ढंग से प्रस्तुत किया है—“संगठन का मूल आधार ग्रामीण गरीब—भूमिहीन, कृषि मज़दूर, गरीब और मध्यम किसान—हैं। साथ ही, शासक वर्ग की नवउदारवादी, नव-फासीवादी और साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों के खिलाफ समृद्ध किसानों के कुछ हिस्सों के साथ व्यापक मुद्दा-आधारित एकता बनाना भी आवश्यक है।”

दस्तावेज़ में 1940 के दशक में किसान सभा के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और सामंतवाद के खिलाफ हुए अनेक संघर्षों का उल्लेख है, जिनका मूल नारा था—“जोतने वाले को जमीन।” इन संघर्षों में हजारों किसान शहीद हुए, अनेक जेलों में डाले गए और यातनाएँ झेलीं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल थीं। प्रारंभिक दौर में किसान सभा ने जातिगत उत्पीड़न और अस्पृश्यता के खिलाफ भी बड़े संघर्षों का नेतृत्व किया। इसके परिणामस्वरूप तेलंगाना में सामंती नियंत्रण से भूमि की मुक्ति संभव हुई तथा केरल, जम्मू-कश्मीर और बाद में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा आदि में भूमि सुधार सफलतापूर्वक लागू किए जा सके।

स्वतंत्रता के बाद, 19 जनवरी 1982 को ट्रेड यूनियनों, किसानों और कृषि मज़दूर संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से देशव्यापी पहली आम हड़ताल का आह्वान किया गया। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के पाँच साथियों की शहादत से प्रेरणा लेते हुए इस दिन को “मजदूर-किसान एकता दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

हाल के दौर में मजदूर-किसान एकता के रणनीतिक लक्ष्य को आगे बढ़ाने के सचेत प्रयासों ने एआईकेएस को कुछ प्रमुख कमजोरियों को दूर करने में मदद की और इसे शोषण के खिलाफ एक प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में स्थापित किया, जिसने शासक वर्ग की शक्तियों को एक हद तक पीछे धकेला। पिछले 11 वर्षों के मोदी शासन में एआईकेएस ने विभिन्न संगठनों के बीच मुद्दा-आधारित एकता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2015 में “भूमि अधिकार आंदोलन” और उससे उपजी एकता व संघर्षों ने सरकार को कॉरपोरेट द्वारा भूमि हड़पने को आसान बनाने वाले अध्यादेश को वापस लेने पर मजबूर किया। 2017 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस फायरिंग में छह किसानों की हत्या के संदर्भ में “अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति” (AIKSCC) का गठन हुआ, जिसने एमएसपी @ C2+50% और कर्ज़ मुक्ति के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

इसी के साथ, एआईकेएस, सीटू और एआईएडब्ल्यूयू जैसे तीन वर्गीय संगठनों के बीच मजबूत एकता बनाने के प्रयासों ने 5 सितंबर 2018 और 5 अप्रैल 2023 को नई दिल्ली में दो विशाल मजदूर-किसान रैलियों के आयोजन को संभव बनाया। फिर भी एक महत्वपूर्ण कमजोरी यह बनी हुई है कि राष्ट्रीय स्तर पर विकसित यह समन्वय अभी राज्यों, जिलों और गाँवों तक नहीं पहुँच पाया है। इस स्थिति की आत्मालोचना कर शीघ्र सुधार आवश्यक है, अन्यथा शासक वर्ग के खिलाफ प्रभावी अखिल भारतीय संघर्ष संभव नहीं होगा।

2020 में एआईकेएससीसी ने दिल्ली चलो आंदोलन और “ग्रामीण भारत बंद” का आह्वान किया, जो ट्रेड यूनियनों द्वारा घोषित आम हड़ताल के साथ जुड़ा था। बाद में यही एआईकेएससीसी “संयुक्त किसान मोर्चा” (SKM) में परिवर्तित हुई, जिसने 2020–21 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।

प्रस्ताव की एक महत्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रीयता के प्रश्न पर दृष्टिकोण के बारे में है। किसान सभा वस्तुतः एक छत्र संगठन है, जिसमें विभिन्न राष्ट्रीयताओं के संगठन जुड़े हुए हैं। कॉरपोरेट-प्रेरित शासक वर्ग संविधान के संघीय ढाँचे को कमजोर कर सत्ता का केंद्रीकरण करना चाहता है। 2017 का जीएसटी अधिनियम राज्यों की कराधान शक्तियों को सीमित कर चुका है। वर्तमान में विभाज्य कर-कोष में राज्यों की हिस्सेदारी घटकर लगभग 33% रह गई है, जिससे वे अधिकाधिक केंद्र पर निर्भर होते जा रहे हैं। प्रस्ताव में कहा गया है—“जब संविधान में निहित संघीय मूल्यों पर हमला हो रहा है और भाषाई राष्ट्रीयताएँ संकट में हैं, तब एआईकेएस को उनकी आवाज़ बनना होगा।” राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता की रक्षा के लिए संघर्ष करना आवश्यक है।

संगठन का असमान विकास और कई राज्यों में ठहराव या गिरावट, अखिल भारतीय स्तर पर संगठन निर्माण में बाधा है। इसलिए अखिल भारतीय, राज्य और जिला स्तर के केंद्रों को मजबूत करना एक महत्वपूर्ण कार्य माना गया है। विभिन्न क्षेत्रों के लिए क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया गया है, विशेषकर पूर्व, उत्तर-पूर्व, हिंदी पट्टी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में।

राज्य इकाइयों को सशक्त बनाने के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और अंतर्विरोधों के आधार पर ठोस नारे और कार्यक्रम विकसित करें। इस संदर्भ में पी. सुंदरैया मेमोरियल ट्रस्ट—एआईकेएस शोध प्रकोष्ठ—की सहायता ली जा सकती है।

कृषि में पूंजीवादी प्रवेश और फसल-आधारित बड़े पैमाने के उत्पादन के बढ़ते रुझान को देखते हुए एआईकेएस ने फसल-आधारित संगठनों के निर्माण को एक रणनीतिक कदम के रूप में चिन्हित किया है। इससे किसानों की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति बढ़ेगी और व्यापक गठबंधन बन सकेंगे।

वर्तमान में एआईकेएस लगभग 1.6 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा किसान संगठन बन चुका है। 2024–25 में पहली बार सभी राज्यों ने जिला-वार सदस्यता और गाँव-स्तरीय इकाइयों का डेटा उपलब्ध कराया, जिससे संगठन में आकलन-विशेषलन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ।

फिर भी, संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी गाँव स्तर पर सक्रिय इकाइयों की कमी है (केरल को छोड़कर)। गाँव इकाइयों को मजबूत करना आवश्यक है, क्योंकि वही संगठन की वास्तविक शक्ति का स्रोत हैं—सदस्यता, वित्त, कैडर, आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन सभी का आधार।

कैडरों और नेताओं को चाहिए कि वे गाँवों में जाएँ, किसानों के बीच रहें, उनकी समस्याओं को समझें और उनके आधार पर संघर्षों का निर्माण करें। उन्हें जनसंपर्क, सदस्यता अभियान और स्थानीय आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

प्रस्ताव यह भी रेखांकित करता है कि एक क्रांतिकारी वर्गीय संगठन को जड़ता, रूढ़िवाद और शासक वर्ग की विचारधाराओं के प्रति समर्पण के खिलाफ एक प्रतिरोधी शक्ति बनना चाहिए। “संगठन ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है”—यह इस प्रस्ताव का केंद्रीय संदेश है।

गुंटूर में पारित यह संगठन संबंधी प्रस्ताव निश्चित रूप से एआईकेएस को उसकी कमजोरियों को दूर करने, अपने जनाधार का विस्तार करने और एक मजबूत, प्रभावी तथा वैचारिक रूप से सुसंगत संगठन के रूप में आगे बढ़ने में सहायता करेगा।

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