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किसान सभा ने कहा: महात्मा गांधी के स्थान पर जी-राम-जी लाना आरएसएस का एजेंडा
अखिल भारतीय किसान सभा ने भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के उस खतरनाक कदम की कड़ी निंदा की है, जिसके तहत महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम – मनरेगा – को हटाकर “विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 (वीबी-जी-राम-जी विधेयक)” लाने की कोशिश की जा रही है। हम आरएसएस के इशारे पर महात्मा गांधी के नाम को हटाकर उसकी जगह ऐसा संक्षिप्त नाम (एक्रोनिम) लाने के प्रयास का विरोध करते हैं, जिसे जी-राम-जी के रूप में पढ़ा जाए। इसके पीछे निहित उद्देश्य साफ है—प्रस्तावित विधेयक मूल कानून के प्रावधानों को कमजोर करेगा और उसमें निहित काम के अधिकार को सीमित कर देगा। किसान सभा ने इस फर्जी विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
मनरेगा खेत मज़दूरों और किसानों के संगठनों के संघर्षों का परिणाम है, जिसमें वामपंथी ताकतों ने इसे साल-भर लागू होने वाला, मांग-आधारित कानून बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई। जब कृषि कार्य उपलब्ध नहीं होता या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय काम की मांग बढ़ती है तब यह रोजगार योजना काम आती है । चूंकि मनरेगा मांग-आधारित है, इसलिए मांग को पूरा करने के लिए बजटीय आवंटन बढ़ाना अनिवार्य है। ‘खेती की कटाई या बुआई के समय पीक सीजन’ के दौरान काम पर रोक लगाने से अंततः मनरेगा का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा। तथाकथित पीक सीजन रबी और खरीफ—दोनों की बुवाई और कटाई के मौसम को कवर कर सकता है, और कुछ कृषि क्षेत्रों में तीन फसलें भी होती हैं। यह पीक सीजन स्वभावतः लचीला होगा और इसे प्रस्तावित कानून के तहत काम से वंचित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 125 दिन काम देने के दावे पूरी तरह खोखले हैं, क्योंकि साल-भर काम की गारंटी वाले मांग-आधारित मनरेगा के बावजूद भी एक साल में औसत कार्य-दिवस 50 से कम रहे हैं।

पूरे देश में, इन तथाकथित ‘कृषि पीक सीजन’ के दौरान भी मशीनीकरण के कारण काम के अवसर घटते जा रहे हैं। मनरेगा के तहत काम करने का विकल्प ग्रामीण मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी था और इससे उन्हें कृषि कार्यों में बेहतर मज़दूरी के लिए सौदेबाज़ी की ताकत मिलती थी। मनरेगा में पुरुष-महिला को समान मज़दूरी की गारंटी थी, जबकि कृषि कार्यों में महिलाओं को कभी भी पुरुषों के बराबर मज़दूरी नहीं मिलती। ग्रामीण अमीरों और ज़मींदारों ने हमेशा मनरेगा का विरोध किया है, तथा भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस विधेयक के जरिए अपना वर्गीय चरित्र उजागर कर रही है। डिजिटल हाज़िरी जैसे पहले किए गए बदलाव, जिनसे लोगों को काम से वंचित किया गया और शोषण बढ़ा, उन्हें अब इस प्रस्तावित विधेयक के जरिए वैध किया जा रहा है।
पिछले 11 वर्षों में नरेंद्र मोदी-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने मनरेगा के लिए धन की कमी रखी है और अब इस विधेयक के जरिए राज्यों पर 40 प्रतिशत खर्च का बोझ डाल रही है। यह निर्णय-प्रक्रिया का केंद्रीकरण है और राज्यों के संघीय अधिकारों का हनन है। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों सहित, राज्यों को आर्थिक रूप से कमजोर करने के एनडीए सरकार के निरंतर प्रयासों की पृष्ठभूमि में यह प्रावधान योजना के लिए ताबूत की आख़िरी कील साबित होगा। यह विधेयक मज़दूर-विरोधी श्रम क़ानूनों की ही प्रकृति का है और इससे बड़ी संख्या में ग्रामीण मज़दूर रोज़गार के अवसरों से बाहर हो जाएंगे, जिससे मजबूरी में पलायन बढ़ेगा।
अखिल भारतीय किसान सभा इस खतरनाक कदम के खिलाफ़ सभी वर्गों से उठ खड़े होने का आह्वान करती है। किसान सभा, खेत मज़दूरों, अन्य मज़दूरों, महिलाओं और युवाओं के संगठनों के साथ मिलकर इस विधेयक के विरुद्धसंघर्ष खड़ा करेगी।