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सम्पादकीय: दरिया झूमके उट्ठेगें तिनकों से न टाले जायेंगे
गुजराती बरस के आख़िरी सप्ताहों में सत्ता में बैठे कुनबे ने जो जल्लादबाजी, हड़बड़ी और बदहवासी दिखाई है वह अनायास और यूँही नहीं है। इसकी वजह भी है, कमबख्ता मतलब क्रोनोलॉजी भी है। एक तरफ ‘अच्छे दिनों’ के 11 साल में जमा हुई चौतरफा असफलताओं के वजन और सर्वव्यापी संकटों के बोझ को पहले से ही टूटी कमर वाली मेहनतकश जनता के ऊपर लाद देने की बेचैनी है तो दूसरी ओर उसी के साथ तेज से तेजतर होते जनता के असंतोष, आक्रोश, विद्रोह और गुस्से के ज्वालामुखी को फूट पड़ने से रोकने के लिए उसे बहलाने, भटकाने की हर मुमकिन-नामुमकिन तिकड़म रचने की धूर्तता भी है।
हालात इतने नुमायाँ हैं कि छुपाते नहीं छुप रहे। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में रुपया जमीन सूंघ रहा है। जिसे मोदी का सबसे खासमखास दोस्त बताते और उसकी आरती उतारते हुए पूरा कुनबा और उसका मुँह से मुँह तक रटी मीडिया अपना गला बिठाए हुए था वह ट्रंप, इन्दी की कारस्तानी के चलते, हर गुजरते दिन के साथ डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश – भारत – पर रेशम शील जमा रहा है। जिसकी तारीफ पर तारीफ में थकने और समाचार कौन के सारे शब्द उड़ेल दिए गए थे वह टैरिफ पर टैरिफ लगाए जा रहा है, बढ़ाए जा रहा है, खेती से उद्योग, व्यापार से रोजगार तक हर क्षेत्र की संभावित विनाशगाथाएं लिखी जा रही हैं। मगर प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार इस सबके खिलाफ चूं तक बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। आजाद हिन्दुस्तान में साम्राज्यवाद के इस कदर इतने सहमेने और आस पड़ोस के देशों सहित दुनिया भर में इस कदर अलग थलग और मित्र-विहीन हो जाने वाली सरकार इससे पहले कभी नहीं हुई। होने को तो अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारने और अपनी ही जनता के ऊपर एक के बाद दूसरा कोड़ा बरसाने वाली सरकार भी पहले कभी नहीं हुई। पिछले कुछ सप्ताहों में एक के बाद एक लगभग हर तबके की जान दूभर कर देने वाली नीतियों की बिजलियाँ सी गिराकर मोदी सरकार ने मेहनतकश जनता के प्रति अपने द्वेष को बिना किसी शर्म के उजागर कर दिया है।
जैसी कि आशंका थी, बिहार चुनाव में मिली अप्रत्याशित जीत के बाद सबसे पहले उन चार लेबर कोड्स – जिन्हें 2019 और 2020 में पारित किया गया था और मजदूर वर्ग का एकजुट प्रतिरोध उनका अमल रोकें हुआ था – को 21 नवम्बर 2025 से लागू किये जाने की अधिसूचना जारी कर दी गई। ध्यान रहे कि भारत की श्रमशक्ति ने उसके कोई दो सौ वर्षों के कुर्बानियों भरे संघर्ष के बाद हासिल अधिकारों को छीनकर उसे लगभग बंधुआ मजदूर की दशा में पहुंचा देने वाले ये लेबर कोड्स वैसे ही कानून हैं जिन्हें अंग्रेजों के जमाने में तब की सेंट्रल असेम्बली – संसद – में जब 8 अप्रैल 1929 को प्रस्तुत किया जा रहा था तभी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंक कर बहरों के कान खोलने के लिए धमाका किया था। यह सन्दर्भ इन श्रम संहिताओं के निहितार्थों को समझने में मददगार होगा।
खेती, किसानी और ग्रामीण आबादी के खिलाफ तो जैसे मोदी युद्ध ही छेड़े हुए हैं। बीज राक्षस कंपनियों के मुनाफे के लिए बीज विधेयक 2025 का मसौदा जारी कर दिया गया है। खेती में जो थोड़ी बहुत जान बची थी उसे भी फूँक हजार वोल्ट्स करंट देने के लिए नया बिजली विधेयक 2025 ला दिया गया है। मगर यहीं पर रुकना नहीं है। “फकीरत में आटा गीला” वाली कहावत भी है। अभी शहर के अमां अभी कहाँ निकले” की तर्ज पर जिसे मनरेगा के नाम से जाना जाता था उस महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को एक तरह से खत्म ही कर दिया गया है। इन सभी विषयों पर इस अंक में सामग्री दी जा रही है इसलिए इनके विनाशकारी प्रभावों को यहाँ नहीं गिना रहे। सार रूप में यह कि कारपोरेट के लिए, कारपोरेट द्वारा, कारपोरेट की सरकार अर्थव्यवस्था के दिवालियेपन को फर्जी और गढ़े गए सी ग्रेड आँकड़ों से ढाँपने की कोशिश की पोल खुलने के बाद अब असमानता की गहरी होती खाई को पूरने के लिए देश की मेहनतकश जनता के जीवन को उसमें दफन कर देना चाहती है। अर्थशास्त्र का न्यूनतम ज्ञान रखने वाले भी जानते हैं यह वह दवाई है जो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक है। इससे संकट दूर नहीं होगा बल्कि जल्दी ही और भी ज्यादा विस्फोटक हो जाएगा।
नजरिया जब सिर्फ, केवल, मात्र कारपोरेट्स का हित हो तो देश की सुरक्षा और संप्रभुता पीछे छूट जाती है। बीमा में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश और नाभिकीय बिजली उत्पादन में भी विदेशी निवेश की अनुमति ऐसे ही फैसले हैं। समर्पण की आतुरता इतनी है कि नाभिकीय संयंत्रों में औद्योगिक दुर्घटनाओं की आर्थिक, नैतिक और आपराधिक जिम्मेदारी से भी आने वाली विदेशी कंपनियों को लगभग मुक्त कर दिया गया है। जिस देश ने भोपाल गैस काण्ड जैसी दुनिया की सबसे विनाशकारी त्रासदी देखी हो उस देश में इस तरह की छूटें किस तरह के हालात पैदा करेंगी इसे सोच कर ही सिहरन होती है।
इन आपराधिक फैसलों को संसद को दरकिनार करके, संसदीय प्रक्रियाओं की अनदेखी करके लिया जाना मौजूदा शासक गठजोड़ का लोकतंत्र के प्रति तिरस्कार का एक और उदाहरण है। संघीय ढांचे को पहले से ही कमजोर किया जा चुका है। गैर भाजपा शासित राज्यों, विशेषकर वाम जनवादी मोर्चे के राज वाले केरल की तो जैसे आर्थिक नाकाबंदी ही की जा रही है।
इन घातक, देशविरोधी, जनविरोधी कदमों पर ध्यान न जाए, उनके दुष्प्रभावों से होने वाली पीड़ा की आह और कराह को भटका दिया जाए इसके लिए सारे घोड़े खोल दिए गए हैं। एक जमाने में जो तरीका सती प्रथा के नाम से दी जाने वाली कुख्यात नरबलि के समय अपनाया जाता था वही आजमाया जा रहा है। सती किये जाने से पहले ज़िंदा जलाई जाने वाली महिला को पहले ढेर सारी अफीम खिलाई जाती थी, उसके बाद खूब तेज़-तेज़ आवाज़ में झांझ, मंजीरे और ढोल बजाये जाते थे। इनकी उत्तेजक धुन और नशे की तरंग में बाकी तो झूमते ही थे, जिसे सती किया जा रहा होता था उसे भी जब तक आग झुलसा नहीं दे देती थी तब तक पता तक नहीं चलता था। यही किया जा रहा है। इधर खेती, किसानी, मज़दूर, रोज़गार, उद्योग, व्यापार सबका अग्निसंस्कार किये जाने की तैयारी की जा रही है, उधर धर्मोन्माद और कट्टरता, विभाजन और नफरत की अफीम चटाई जा रही है। कभी बने बनाये मन्दिर पर ध्वज फहराने तो कभी अंडमान में सावरकर की प्रतिमा के बहाने, कभी वन्दे मातरम् के बहाने तो कभी बिना किसी बहाने के ही हिन्दू राष्ट्र का ढोल बजाया जा रहा है।
आरएसएस की 100वीं साल के बहाने चलाये जा रहे अभियान में कोलकाता में बोलते हुए संघ सुप्रीमो मोहन भागवत ने लगभग धमकी देने के अंदाज़ में कहा कि:
“आरएसएस, जो हिंदुत्व की विचारधारा पर दृढ़ता से विश्वास रखता है, इस बात की परवाह नहीं करता कि संसद संविधान में संशोधन करके भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करे या नहीं। अगर संसद कभी संविधान में संशोधन करके वह शब्द जोड़ने का फैसला करती है, तो करे या न करे, ठीक है। हमें उस शब्द की परवाह नहीं है क्योंकि हम हिंदू हैं, और हमारा राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र है।” “यही सत्य है।” इसे गले उतारने की मंशा से उन्होंने यह असत्य भी गढ़ा कि “जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था हिंदुत्व की विशेषता नहीं है।”
मगर सब कुछ हुक्मरानों के चाहने से नहीं हो जाता। वास्तविकता हमेशा उभर कर आती है। इसी दौरान देश भर में उभरे प्रतिरोध और संघर्ष इसकी गवाही देते हैं। सारे श्रम संगठनों के 12 फरवरी को देश भर में आम हड़ताल करने के आह्वान और उसे किसानों के साझा मंच संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा दिए गए समर्थन से ये एक ऐसी नयी ऊँचाई तक पहुँचेंगे जहाँ से संघर्ष की अनगिनत धाराएँ निकलेंगी और एक बार फिर कॉरपोरेट हिंदुत्व की सरकार को घुटनों पर लाएँगी। जो दरिया झूम के उठेंगे तिनकों से न टाले जाएँगे।