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फ्लिपकार्ट ने किसानों की आजीविका को खतरे में डाला, कर्नाटक में दूध 1 रुपये प्रति लीटर में बेचा

फ्लिपकार्ट ने किसानों की आजीविका को खतरे में डाला, कर्नाटक में दूध 1 रुपये प्रति लीटर में बेचा

अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) कर्नाटक में ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म फ्लिपकार्ट द्वारा 1 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध बेचने की चौंकाने वाली प्रचारात्मक बिक्री की कड़ी निंदा करती है। अमेरिकी खुदरा दिग्गज वॉलमार्ट के बहुमत स्वामित्व वाली फ्लिपकार्ट कंपनी की इस लापरवाह छूट योजना ने कर्नाटक भर के डेयरी किसानों में स्वाभाविक रूप से व्यापक आक्रोश पैदा किया है और साथ ही केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय, जिसका नेतृत्व अमित शाह कर रहे हैं, पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। किसी प्रभावी हस्तक्षेप के अभाव में ऐसा प्रतीत होता है कि शाह ने विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों और बाजार के दबाव के आगे समर्पण कर दिया है।

कर्नाटक में दूध उत्पादन कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) के अंतर्गत सहकारी संस्थाओं के विशाल नेटवर्क पर आधारित है, जिसे दशकों से लाखों छोटे और सीमांत किसानों ने मिलकर खड़ा किया है। AIKS का मानना है कि फ्लिपकार्ट द्वारा इतनी सस्ती दर पर दूध की बिक्री कोई साधारण मार्केटिंग अभ्यास नहीं है, बल्कि वैश्विक पूंजी से समर्थित बड़ी प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली शिकारी मूल्य निर्धारण (प्रिडेटरी प्राइसिंग) की एक क्लासिक मिसाल है। ऐसी रणनीतियाँ अस्थिर कीमतों पर आवश्यक वस्तुओं को बेचकर बाजार पर कब्ज़ा करने, मौजूदा सहकारी संस्थाओं को कमजोर करने और अंततः खरीद व वितरण पर कॉरपोरेट नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से अपनाई जाती हैं।

ऐसी कीमत—चाहे वह अल्पकालिक ही क्यों न हो—उपभोक्ताओं की सोच को बदलते हुए विकसित देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से सस्ते दूध के शुल्क-मुक्त आयात का रास्ता खोल सकती है, जहाँ एक लीटर दूध की कीमत लगभग 32–36 रुपये है। उपभोक्ता सस्ता दूध चुनेंगे, जिससे घरेलू डेयरी किसानों को मिलने वाली कीमतों में कम से कम 10–15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। जिस तरह से केंद्र सरकार हाल के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के माध्यम से अमेरिका, यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम आदि देशों की मांगों के आगे झुकती रही है, उसे देखते हुए निकट भविष्य में ऐसी स्थिति बनने की आशंका है।

रिपोर्टों के अनुसार, प्रचार अवधि के दौरान लाखों लीटर दूध कृत्रिम रूप से बेहद कम कीमत पर बेचा गया, जबकि बेंगलुरु मिल्क यूनियन लिमिटेड (BAMUL) जैसे सहकारी संघों की दैनिक बिक्री में लगभग 50,000 लीटर की कमी दर्ज की गई। कर्नाटक की डेयरी अर्थव्यवस्था 16,000 से अधिक प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियों और 20 लाख से अधिक दूध उत्पादकों पर आधारित है, जो प्रतिदिन एक करोड़ लीटर से अधिक दूध की KMF को आपूर्ति करते हैं। सहकारी व्यवस्था में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर ग्रामीण आय और डेयरी किसानों की आजीविका सुरक्षा पर पड़ता है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब डेयरी किसान पहले से ही बढ़ती लागत, भुगतान में देरी और दूध उत्पादन के लिए उचित लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

AIKS कर्नाटक भर के डेयरी किसानों और सहकारी संस्थाओं, मजदूरों और ट्रेड यूनियनों तथा उपभोक्ताओं से आह्वान करती है कि वे बड़ी कॉरपोरेट प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों के ऐसे प्रयासों का एकजुट होकर विरोध करें और यदि वे अत्यधिक-सस्ता दूध बेचने की इस नीति को जारी रखते हैं तो उनके दुग्ध उत्पादों का बहिष्कार करें। साथ ही, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा इस मामले में प्रिडेटरी प्राइसिंग की जांच तुरंत शुरू की जानी चाहिए। हम यह भी मांग करते हैं कि सहकारी संस्थाओं को कॉरपोरेट हमलों से बचाने में विफल रहने के लिए केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह जवाबदेह ठहराए जाएँ।

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