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एफ सी आई हड़पते कारपोरेट: खाद्य सुरक्षा के गिद्ध भोज की तैयारी
फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) की “हब एंड स्पोक” साइलो योजना में उभर रहे डुओपॉली (दो कंपनियों का कब्ज़ा) नियंत्रण को लेकर न्यूज़लॉन्ड्री का हालिया खुलासा अत्यंत चिंताजनक है। न्यूज़लॉन्ड्री की जांच स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की मिलीभगत से अदानी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने “16,500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 134 में से 110 साइलो के ठेके हासिल कर लिए हैं।” अनुमान है कि कुल 60 लाख मीट्रिक टन अनाज में से लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन इन कंपनियों के स्वामित्व वाले साइलो में रखा जाएगा। अखिल भारतीय किसान सभाने सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा अवसंरचना पर कॉरपोरेट कब्जे को बढ़ावा देने की इस प्रक्रिया की कड़ी निंदा करती है।
एफसीआई किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनाज खरीदता है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग 81 करोड़ लोगों को वितरित करता है। एफसीआई द्वारा शुरू किया गया 20,000 करोड़ रुपये का साइलो आधुनिकीकरण कार्यक्रम भारत की अनाज आपूर्ति श्रृंखला को बड़े पैमाने पर पुनर्गठित और आधुनिक बनाने के लिए है, जिसका घोषित उद्देश्य “खाद्यान्नों के कुशल और टिकाऊ भंडारण तथा परिवहन को सुनिश्चित करना” है। खाद्य सुरक्षा के रणनीतिक महत्व को देखते हुए एफसीआई ने प्रारंभ में एक “एकाधिकार-विरोधी” (एंटी-मोनोपॉली) प्रावधान शामिल करने का सुझाव दिया था, ताकि कोई एक कंपनी सभी परियोजनाओं पर कब्जा न कर सके।
जांच से संकेत मिलता है कि अदानी के हितों को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) ने 13 मई 2022 को सार्वजनिक-निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति (पीपीपीएसी) की एक महत्वपूर्ण बैठक में इस “एकाधिकार-विरोधी” प्रावधान को हटाने के लिए मिलीभगत की। तर्क यह दिया गया कि बाजार की शक्तियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने दिया जाना चाहियें और सरकारी हस्तक्षेप बाजार में असमानता पैदा करेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, कॉरपोरेट हितों के लिए किया गया इस नीतिगत सरकारी हस्तक्षेप के बाद अदानी ने साइलो आधुनिकीकरण कार्यक्रम के प्रथम चरण के दूसरे दौर में “हर एक ठेका जीत लिया”। “दूसरे चरण तक एक डुओपॉली व्यवस्था उभर चुकी थी। अदानी और लीप इंडिया भारत के सबसे बड़े आधुनिक अनाज भंडारण कार्यक्रम पर हावी हो चुके थे।”
जांच में उस गुप्त प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है जिसके माध्यम से विभिन्न सरकारी एजेंसियों और संस्थानों की सक्रिय मिलीभगत से बाजार में यह भयावह केंद्रीकरण पैदा किया गय।जो तथाकथित उदार प्रतिस्पर्धा कानूनों की भावना और प्रावधानों दोनों का उल्लंघन करता है। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार ने ऐसी शर्तें और नियम बनाए जो केवल “मजबूत वित्तीय क्षमता” (डीप बैलेंस शीट) वाली कंपनियों के पक्ष में थे, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, छोटी कंपनियां, सहकारी संस्थाएं आदि बाहर हो गईं।
यह सर्वविदित है कि साम्राज्यवादी शक्तियां और उनसे मिली हुई भारतीय बड़ी पूंजी भारतीय कृषि क्षेत्र में लूटपरक संचय (प्रिडेटरी अक्यूम्युलेशन) को बढ़ावा देने के इच्छुक हैं। मोदी सरकार द्वारा बनाए गए तीन काले कृषि कानूनों को आगे बढ़ाने में अदानी समूह की भूमिका और उसके विरुद्ध किसानों के ऐतिहासिक संघर्ष की स्मृति आज भी ग्रामीण जनता के मन में ताज़ा है। कृषि लॉजिस्टिक्स और भंडारण क्षेत्र में कार्यरत लीप इंडिया को शक्तिशाली विदेशी निजी इक्विटी फंडों (ब्रिटेन समर्थित नीव फंड और डेनमार्क के एसजीडी फंड) का समर्थन प्राप्त बताया जाता है।
अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार एफसीआई साइलो परियोजना में यह सरकारी संरक्षण प्राप्त बाजार केंद्रीकरण, भारतीय कृषि के कॉरपोरेटकरण की दिशा में आरएसएस-भाजपा सरकार का एक छिपा हुआ कदम है।
किसान सभा ने मांग की है कि मोनोपोली रोकने वाले “एकाधिकार-विरोधी” प्रावधान को तुरंत बहाल किया जाए और किसी भी एक कॉरपोरेट समूह के साइलो भंडारण क्षमता पर नियंत्रण की सीमा निर्धारित की जाए। साथ ही यह भी मांग करते है कि, पीपीपीएसी द्वारा “एकाधिकार-विरोधी” तथा बाजार केंद्रीकरण को रोकने वाले अन्य प्रावधानों को हटाने में निभाई गई भूमिका की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित की जाए।
कॉरपोरेट एकाधिकारों को दीर्घकालिक हस्तांतरण करने के बजाय, सार्वजनिक निवेश के माध्यम से एफसीआई की स्वयं की भंडारण क्षमता को मजबूत करना समय की मांग है।