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गाय के नाम पर वोट और विभाजन का खतरनाक एजेंडा
भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और छद्म नामों से सक्रिय अनेकों अनेक संगठन लंबे समय से किसान व आम जनता में अपने आपको गाय या गौ-वंश के स्वयंभू रक्षक के रूप में सक्रिय रहे हैं। लोगों में गाय के प्रति जो स्वाभाविक आस्था रही है उसका दोहन ये ताकतें धार्मिक भावनाओं को भड़काते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए करते रहे हैं। पहले बैलों से खेती होती थी। गाय ही बैलों को जन्म देती थी और दूध भी गाय देती थी। अब बैल और दूध की बजाय वोट के लिए गाय का प्रयोग होने लगा। विशेषकर कारपोरेट -सांप्रदायिक गठजोड़ के द्वारा केंद्र व अनेक प्रदेशों में सत्ता हथियाने के बाद इस ख़तरनाक खेल के तहत अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय व दलितों के ऊपर हिंसा बरपाने और उनकी हत्याएं तक करने के घृणित अपराध किसी से छिपे नहीं हैं। इनका ये राजनीतिक प्रोजेक्ट अभी तक कमोवेश देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित था। लेकिन अभी हाल में पश्चिम बंगाल में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में जनता के बीच सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए गाय का एजेंडा भी प्रयोग में लाया गया। ऐसा पहले नहीं होता था । इसका अब जो रूप देखने को मिला उसका संज्ञान अतिरिक्त गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
वास्तव में इन लोगों का गाय के प्रति कितना लगाव है यह भी समझना मुश्किल नहीं। हाल ही में राजस्थान के मशहूर शहर जैसलमेर से मात्र 6-7 किलोमीटर दूरी पर खुले में सड़ रहे सैंकड़ों गायों व बैलों के कंकालों के हृदय विदारक दृश्यों ने भाजपा की गाय के नाम पर राजनीति के पाखंड को एक बार फिर बेनक़ाब करने का काम किया है। नगरपालिका के निर्धारित यार्ड और उसके बाहर तपती गर्मी में नागरिकों द्वारा देखे जाने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए भयभीत करने वाले विडियो फुटेज से देशभर में भाजपा के गौरक्षा संबंधी दावों पर स्वाभाविक तौर पर अनेक सवाल उठे हैं। लेकिन कथित गौरक्षकों के वही गिरोह जो गौमांस खाने और गौहत्या के झूठे आरोप लगाकर निर्दोष अल्पसंख्यक व दलित समुदाय के पशुपालकों को मौत के घाट उतारने के लिए कुख्यात हैं, वे इस मामले में चुप्पी साधे बैठे हैं।
बडा़ सवाल यह है कि भाजपा शासित प्रदेशों में सरकारी ग्रांटों पर चलने वाली हजारों -हज़ार गौशालाओं के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में भूखे -प्यासे गौवंश मौत के मूंह में कैसे चले गए जिसकी संख्या कुछ प्रत्यक्षदर्शी हजार से भी ज्यादा बताते हैं।
यह भी गौरतलब है कि नगर पालिकाओं में मरे हुए पशुओं को उठाने और उनको विधिवत तौर पर और निर्धारित स्थानों पर सुरक्षित तरीके से दफनाने के लिए ठेके छोड़े जाते थे। मृत पशुओं की त्वचा उतारने और चमड़ा उद्योग में कच्चे माल की तरह भेजा जाता था। हड्डियों से भी पोल्ट्री फीड व अन्य उत्पाद बनाने में उपयोग था। इस व्यवस्था पर रोक लगने से देशी चमड़ा उद्योग को भारी धक्का लगा । इस व्यवसाय में लगे कितने लोगों के रोजगार चले गए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में अपना चमड़ा उत्पाद बेचने का रास्ता साफ हो गया। ये असल में कारपोरेट सांप्रदायिक गठजोड़ वाली मोदी सरकार के शासन में नवउदारवाद की देशभक्ति का ऐसा नायाब संस्करण स्थापित किया गया है जो जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, गरिमा के साथ आजीविका कमाने के अधिकारऔर न्याय सम्मत संवैधानिक व्यवस्था को खोखला कर रहा है।
उधर गाय से जुड़ी भावनाओं को राजनीतिक रूप से भुनाकर बहुमत हिंदू जनता को लामबंद करने का हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट का विस्तार भी देश भर में भाजपा के विस्तार के अनुपात में बढ़ता ही जाता रहा । पहले हिंदी प्रदेशों में और बाद में लाया असम ले जाते हुए हाल के असेंबली चुनाव में पश्चिमी बंगाल में भी हिंदू मुस्लिम पालेबंदी के लिए पूरी निर्लज्जता और शातिरता से गौ -हत्या के नाम पर नफरत फै़ैलाने का काम हुआ। इस खेल का बहुत हास्यास्पद रुप में पर्दाफाश तो हुआ परंतु तब तक भाजपा पहली बार तृणमूल कांग्रेस को हटाकर सत्ता पर काबिज हो चुकी थी।
दरअसल हुआ यह कि चुनाव के दौरान ‘गौ-माता’ की हत्या पर सख्त पाबंदी लगाने के भाजपा के जुमले का असर यह हुआ कि चुनाव के तुरंत बाद बकर ईद के अवसर पर लगने वाले परंपरागत पशु मेले में हिंदुओं द्वारा बेचने के लिए लाए गए गाय और बैलों को खरीदने से मुस्लिम समुदाय ने गुरेज किया। इस स्थिति में भाजपा के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को पलटी मारकर यह घोषणा करनी पड़ी कि 14 साल से ऊपर के गौवंश की हत्या की जा सकती है। इसके बावजूद भी मुस्लिम समुदाय ने ऐसी मांग उठा दी कि सब हैरान रह गए। मुस्लिम संगठनों ने मांग की है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। अब भाजपा और उसके संघ परिवार की दुविधा यह बन गई कि “पवित्र माता” को पशु का दर्जा कैसे दिया जा सकता है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के पलटी मारने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा-आर एस एस की यह चिरपरिचित कुटिल नीति रही है कि वे अलग अलग मौकों पर अलग-अलग बयान ही नहीं दे सकते बल्कि एक ही समय पर उनके अलग नेताओं को भिन्न प्रकार की बयानबाजी करने में महारत हासिल है। वे एक जगह मांस मछली खाने को पाप की तरह प्रचारित करेंगे और दूसरे प्रदेश के चुनाव में मछली को शाकाहारी भोजन बताएंगे। उत्तर पूर्व और गोवा के चुनावों में में सस्ता बीफ उपलब्ध करवाने का वादा करेंगे और हिंदी प्रदेशों में गो -कशी और बीफ खाने को लेकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फै़ैलाने काम करते मिलेंगे।
अलबत्ता गाय के नाम पर राजनीति किये जाने का खामियाजा किस किस रूप में किसान मजदूर को भुगतना पड़ रहा है इसका भी जायजा लेना जरूरी है। कृषि में बडे़े पैमाने पर तकनीकी और यंत्रों के आने के बाद बैलों का उपयोग लगभग समाप्त हो गया। इसलिए बैलों को जन्म देने वाली गाय के प्रति धीरे धीरे जो उपय़ोगिता और आस्था थी वह जाहिरा तौर पर नहीं रही। दूध देने के मामले में भी गाय का स्थान या तो भैंसों ने ले लिया या जर्सी और शंकर नस्लों की गाय ने ले लिया। आप देखेंगे कि गांव व शहरों में जो आवारा पशु हैं उनमें अनिवार्य रूप से सभी के सभी गाय या सांड ही हैं। इनकी संख्या को नियंत्रित करने के कोई उपाय नहीं किए जा रहे जैसे सांडों की नसबंदी।
देश में कुल मिलाकर 20 लाख आवारा पशु हैं जो फसलों की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है। हाइवे पर मौजूद आवारा पशुओं की बेतहाशा मौजूदगी दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बनी हुई हैं। इसके बावजूद राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में बहुत सारे किसान दूध के लिए देशी गाय रखते हैं। दूध की मात्रा कम होते हुए भी गरीब परिवार इसलिए भी देशी गाय रखते हैं कि वह कम कीमत की है और रखरखाव का खर्च भी कम है। बूढी़ होने पर इन गायों को आवारा छोड़ दिया जाता है। बछड़े व बैल भी किसी उपयोग के नहीं रहते और ये सब फसलों की बर्बादी करते हैं।
राजस्थान के गाय पालक बडी़ संख्या में अभी भी बड़े सींगों वाला गोवंश पालते हैं और हरियाणा में महीनों तक इन्हें चराने के लिए लाते हैं और दूध -घी भी बेचते हैं । इन गायों के नस्ल सुधार और डेयरी विकास के लिए बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। गरीब तबकों को गायों के लाने ले जाने का काम बहुत जोखिम का हो गया है। हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के मेवात क्षेत्रों में में मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में पशुपालन का व्यवसाय करता है। लेकिन गोकशी का निरंतर प्रचार करके उनका राकक्षीकरण करते हुए उन्हें हिंसा का शिकार बनाया जाता रहा है।
यह गौरतलब है कि गौ-रक्षा के कथित एजेंडा के कई आयाम हैं जिन पर एकमुश्त काम चल रहा होता है। गोवंश के पशु मेले बंद किए जा चुके और उनकी खरीद फ़रोख्त बहुत जटिल कर दी गई है। गौसंवर्धन व गोसंक्षरण के ऐसे कानून बनाए गए हैं जिनके क्रियान्वयन के लिए पुलिस और हथियारबंद गो-रक्षक गिरोह पूरे तालमेल में काम करते हैं। इनका भयंकर आतंक है और कितने ही निर्दोष पशुपालकों की दिन दहाड़े हत्याएं की जा चुकी। पशु ढोने वाले वाहनों का पीछा करके उनसे वसूली करने का धंधा चल रहा है।
6 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक सार्वजनिक संबोधन में यह कहना पडा़ था कि “बहुत सारे असामाजिक तत्व दिन में गोभक्त का भेष रखते हैं और रात में गोरखधंधा करते हैं”।
हरियाणा का 2002 में बरपाया गया कुख्यात दुलीना हत्याकांड भुलाया नहीं जा सकता जिसमें पांच दलित युवाओं की दशहरा त्योहार के दिन पुलिस की मौजूदगी में दिन दहाड़े हत्या कर दी गई थी। अपने परिवारों के एक मात्र आजीविका कमाने वाले ये युवक पशु त्वचा उतारने का पेशेवर काम करते थे और उस दिन सड़क के किनारे पडी़ एक मृत गाय को वाहन में लाद रहे थे। साथ लगती चौकी में पुलिस ने उन्हें बिठा लिया। दशहरा मनाकर झज्जर से लौटती हुड़दंगी भीड़ को पुलिस से इशारा पाकर बारी बारी से पांचों को बाहर निकाल कर मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद कथित गो रक्षक गिरोहों द्वारा मारे गए निर्दोष लोगों की लंबी फहरिस्त है। उत्तर प्रदेश के दादरी में बीफ रखने के झूठे आरोप में अखलाक़ नाम के व्यक्ति की हत्या की गई। जो अन्य कई सारी कत्ल की वारदातें हुई हैं उनमें मेवात के किसान पहलू खान,जुनौद व नासिर, रकबर खान और फरिदाबाद के 20 वर्षीय छात्र आर्यन मिश्रा की हत्याएं भी शामिल हैं। पहलू खान और अन्य ये तमाम घृणित अपराध इतनी दबंगई से अंजाम दिए जाते हैं जैसे गाय के नाम पर इंसानों की हत्या करने का उन्हें लाइसेंस मिला ह़ो । पीड़ित परिवारों से संवेदना प्रकट करने और आर्थिक सहायता देने अखिल भारतीय किसान सभा का नेतृत्व जब मेवात में गया तो उनके घरों में दुधारू गाय थी।
बहरहाल जैसलमेर में खुले में बिखरे सैंकड़ों गौ-कंकाल प्रकरण पर लौटते हुए यह सवाल लाजिमी तौर पर उठता है कि आखिर ऐसे दर्दनाक दृश्यों के वायरल विडियो देखकर भी गौभक्तों की भावनाएं आहत क्यों नहीं हुई ? इसका स्वाभाविक सा जवाब यही है कि राजस्थान में अभी कोई चुनाव नहीं होने वाले हैं। परंतु जो अन्य बड़े सवाल इस संदर्भ में खड़े हैं उन पर तो आम जनता को सोचना पड़ेगा और इन ताकतों को अलग-थलग करना होगा।