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एल नीनो का खतरा मंडरा रहा है: क्या भारत तैयार है?
पिछले कुछ महीनों से एक विदेशी शब्द – एल नीनो – देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब तक के अनियमित मानसून ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है कि हालात और खराब हो सकते हैं। सूखे, फसल बर्बादी और किसानों की आत्महत्याओं की काली छाया फिर से मंडराने लगी है।
आखिर यह एल नीनो क्या है? इसका इतिहास क्या रहा है? फिलहाल इसकी स्थिति क्या है? भारतीय किसानों पर इसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है? केंद्र सरकार की क्या तैयारी है? और क्या वह पर्याप्त है?
सबसे पहले यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि जलवायु संबंधी आपदाओं की उत्पत्ति भले ही प्राकृतिक हो, लेकिन उनके कारण लोगों के जीवन और आजीविका पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभाव पूरी तरह मानव-निर्मित होते हैं और वर्गीय असमानताओं से तय होते हैं। एल नीनो जैसी प्राकृतिक आपदा का सबसे पहला और सबसे गहरा प्रहार गरीबों पर ही पड़ता है।
एल नीनो क्या है?
एल नीनो और इसका विपरीत चरण ला नीना, दोनों मिलकर एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन नामक प्राकृतिक महासागरीय-वायुमंडलीय प्रणाली के दो चरण हैं।
ला नीना के दौरान प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय भाग में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। इससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है—कुछ क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा या अधिक गर्मी पड़ती है।
इसके विपरीत, एल नीनो के दौरान समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप दुनिया के अनेक हिस्सों में चरम मौसम, सूखा और भीषण गर्मी की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। एल नीनो का समग्र प्रभाव पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने वाला होता है। भारत में इसका सबसे बड़ा असर मानसून पर पड़ता है, क्योंकि यह वर्षा को दबा देता है। इस वर्ष भी भारत में सामान्य से काफी कम मानसून रहने की आशंका मुख्यतः विकसित हो रहे एल नीनो के कारण है।
ENSO के चरण तथा एल नीनो और ला नीना की तीव्रता का निर्धारण प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र, जिसे नीनो 3.4 क्षेत्र कहा जाता है, में समुद्र की सतह के तापमान के आधार पर किया जाता है।
जब इस क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान की औसत असामान्यता 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाती है, तब एल नीनो की आधिकारिक घोषणा की जाती है। नवीनतम बुलेटिन के अनुसार यह तापमान बढ़कर 1.2 डिग्री सेल्सियस हो चुका है। यदि यह 2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, तो इसे अत्यंत प्रबल एल नीनो माना जाएगा।
एल नीनो से मिले सबक
हाल के वर्षों में 2015–16 का एल नीनो सबसे शक्तिशाली माना जाता है। यह लगभग दो वर्षों (2014 से 2016) तक बना रहा और इस दौरान कई जलवायु रिकॉर्ड टूट गए। इस अवधि में नीनो 3.4 सूचकांक लगातार चार महीनों से अधिक समय तक 2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहा।
भारत में 2014 और 2015 इक्कीसवीं सदी के चार सबसे शुष्क वर्षों में शामिल हैं। इन दोनों वर्षों में मानसूनी वर्षा सामान्य से 90 प्रतिशत से भी कम रही। इन्हीं वर्षों में विशेष रूप से महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों से किसानों की आत्महत्याओं की दर्दनाक घटनाएँ बड़ी संख्या में सामने आई थीं।
दरअसल, भारत के कई सबसे भीषण सूखे एल नीनो वाले वर्षों में ही पड़े हैं—1972, 1982, 2009 और 2015। वर्ष 2000 के बाद देश में सामान्य से कम या कमजोर मानसून वाले 11 वर्षों में से छह वर्ष भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा एल नीनो वर्ष घोषित किए गए थे।
वर्तमान एल नीनो की शुरुआत जून में हुई और इसके 2027 तक जारी रहने तथा और अधिक तीव्र होने की संभावना व्यक्त की गई है। जुलाई की शुरुआत में ही भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने चेतावनी दी थी कि जून में 40 प्रतिशत वर्षा की कमी के बाद पूरे देश में मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत के 94 प्रतिशत से कम रहने की संभावना है।
सामान्य वर्षा का अनुमान केवल राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक तक सीमित था। कमजोर मानसून के प्रभाव अब अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।
कमजोर मानसून के आर्थिक परिणाम
कमजोर मानसून का अर्थव्यवस्था पर मुख्यतः तीन प्रकार से प्रभाव पड़ता है। पहला, इससे कृषि उत्पादन घटता है और अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान कम होता है। दूसरा, ग्रामीण आय में गिरावट आती है, जिससे समग्र मांग कमजोर पड़ती है। तीसरा, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
जहाँ तक कृषि उत्पादन का सवाल है, भारत में खरीफ बुवाई की धीमी गति इसका स्पष्ट संकेत है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 10 जुलाई तक किसानों ने 53.12 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई की थी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 63.25 मिलियन हेक्टेयर थी। यह बुवाई क्षेत्र सामान्य रकबे—जो 2021–25 के औसत पर आधारित है—से भी 18 लाख हेक्टेयर कम है। यह दर्शाता है कि वर्षा पर निर्भर कई राज्यों में बुवाई की गति काफी धीमी रही। धान की बुवाई में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में भारत के सामने पिछले कृषि वर्ष (2024–25) में खाद्यान्न उत्पादन में हुई प्रगति को खो देने का खतरा मंडरा रहा है।
दूसरी बात यह है कि आज भी कृषि भारत की 55 प्रतिशत आबादी की आजीविका का आधार है और 46 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देती है। इसलिए कृषि उत्पादन में गिरावट का सीधा असर करोड़ों किसानों और कृषि मजदूरों की आय पर पड़ना तय है। अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भारत रामास्वामी के अनुसार किसानों की आय में 10 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। जब किसानों की आय घटती है, तो ग्रामीण बाजारों पर निर्भर उद्योगों और व्यवसायों की मांग भी प्रभावित होती है।
तीसरा प्रभाव महंगाई के रूप में सामने आता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने जून बुलेटिन में चेतावनी दी है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो घरेलू महंगाई बढ़ सकती है। 18 जून तक उपलब्ध दैनिक मूल्य आँकड़ों से पता चलता है कि खाद्य महंगाई में वृद्धि शुरू हो चुकी थी तथा खाद्य तेल, आलू, प्याज और टमाटर जैसी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने लगे थे।
इन तीनों परिणामों को उस उर्वरक संकट के साथ भी जोड़कर देखना चाहिए, जो ईरान पर अमेरिका–इज़राइल युद्ध के कारण पैदा हुआ है। इस संकट ने सरकार पर बफर स्टॉक जारी करने, अधिक मात्रा में उर्वरकों का आयात करने और विदेशी मुद्रा खर्च करने का दबाव बढ़ा दिया है। इसका अंततः रुपये की विनिमय क्षमता और क्रय शक्ति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। एक प्रमुख बैंक ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि एल नीनो और सूखे की संयुक्त स्थिति भारत की जीडीपी वृद्धि दर में 20 से 65 बेसिस पॉइंट तक की कमी ला सकती है।
सरकार की धीमी प्रतिक्रिया
हालाँकि केंद्र सरकार का कहना है कि मानसून की स्थिति में सुधार हो रहा है। 8 जुलाई को नई दिल्ली में एल नीनो की स्थिति की समीक्षा के लिए आयोजित उच्चस्तरीय बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश में मानसून की स्थिति बेहतर हुई है। उनके अनुसार जून में जहाँ वर्षा में 33 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी, वहीं जुलाई में यह कमी घटकर 24 प्रतिशत रह गई। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों में अच्छी वर्षा हुई है, जिसके कारण वर्षा की कमी वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 रह गई है।
लेकिन वास्तविक स्थिति क्या है? मंत्री के इस बयान के लगभग एक सप्ताह बाद तक, केवल पूर्वोत्तर भारत और हिमालय की तलहटी के कुछ अलग-थलग क्षेत्रों में ही भारी वर्षा हो रही थी, जबकि देश का अधिकांश भाग नए मौसम तंत्र के सक्रिय होने की प्रतीक्षा कर रहा था। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून पहले ही ब्रेक फेज़ में प्रवेश कर चुका था और जुलाई के अंत तक किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं थी।
सरकार की राहत रणनीति मुख्य रूप से किसानों को कम अवधि में पकने वाली और कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों—जैसे मक्का, बाजरा और मूंग—की खेती अपनाने की सलाह देने तक सीमित रही है, ताकि वर्षा में देरी के प्रभाव को कम किया जा सके।
केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार, मानसून की प्रगति, फसल बुवाई, फसलों की स्थिति और बाजार के रुझानों की निगरानी के लिए एल नीनो मॉनिटरिंग सेल, क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप, राज्य स्तरीय नियंत्रण कक्ष तथा नामित अधिकारियों की व्यवस्था की गई है। संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक कार्ययोजनाएँ भी तैयार की गई हैं।
लेकिन जब वास्तविक संकट गहराएगा, तब यह देखना बाकी है कि क्या ये उपाय उन संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर पाएँगे, जिनमें देश के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 48 प्रतिशत अभी भी वर्षा पर निर्भर है, और 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण पहले से ही निम्न स्तर पर है। यही वे कमजोरियाँ हैं जो किसी भी कमजोर मानसून को गंभीर कृषि और आर्थिक संकट में बदल सकती हैं।
वास्तविक चुनौती: जल सुरक्षा के लिए सार्वजनिक निवेश
भारत की एल नीनो के प्रति बार-बार सामने आने वाली संवेदनशीलता अंततः केवल मौसम विज्ञान की समस्या नहीं, बल्कि विकास की समस्या है। जैसा कि प्रोफेसर आर. रामकुमार ने तर्क दिया है, देश को आपदा आने के बाद राहत पहुँचाने की नीति से आगे बढ़कर ऐसी रणनीति अपनानी होगी, जिसमें संकट आने से पहले ही सूखे के जोखिम को कम करने के लिए निवेश किया जाए। अर्थात, आपदा प्रबंधन का केंद्र राहत नहीं, बल्कि पूर्व-तैयारी होना चाहिए।
लेकिन नवउदारवादी दौर में कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश लगातार कमजोर हुआ है। कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों में सार्वजनिक पूंजी निर्माण कई दशकों से सकल घरेलू उत्पाद के केवल 0.4 से 0.6 प्रतिशत के बीच ही बना हुआ है, जो ग्रामीण बुनियादी ढाँचे में आवश्यक बदलाव लाने के लिए बेहद अपर्याप्त है।
हरित क्रांति के दौर में कृषि विकास को गति देने वाली बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं में सार्वजनिक निवेश लगभग ठहर गया है। इसके स्थान पर धीरे-धीरे निजी स्वामित्व वाले बोरवेलों के माध्यम से भूजल दोहन पर अधिक निर्भरता बढ़ती गई। परिणामस्वरूप, आज भी भारत के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है, जिससे करोड़ों किसान मानसून की विफलता के सामने असुरक्षित बने हुए हैं।
दशकों की योजनाओं और सरकारी दावों के बावजूद आज भी शुद्ध बोए गए क्षेत्र का केवल लगभग 52 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचाई की सुविधा से जुड़ा है, जबकि शेष क्षेत्र वर्षा की अनिश्चितता पर निर्भर है।
इस उपेक्षा के गंभीर परिणाम सामने आए हैं। भारत में 5,300 से अधिक बड़े बाँध होने के बावजूद 1990 के दशक के बाद से नहर सिंचाई के विस्तार की गति में तेज़ गिरावट आई है। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में सिंचाई पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में लगातार घटा है। साथ ही, पर्याप्त वित्तीय आवंटन न होने और लगातार देरी के कारण अनेक बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ आज भी अधूरी पड़ी हैं।
इसके परिणामस्वरूप किसान तेजी से निजी भूजल दोहन पर निर्भर होते जा रहे हैं। यह व्यवस्था न केवल किसानों के लिए अत्यधिक महंगी है, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी टिकाऊ नहीं है, विशेषकर तब जब लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनी रहे।
आपदा से निपटने की तैयारी केवल वर्षा की निगरानी करने या संकट शुरू होने के बाद किसानों को फसल बदलने की सलाह देने तक सीमित नहीं हो सकती। वास्तविक समाधान ऐसे मजबूत सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण में है, जो सूखा पड़ने से पहले ही जल सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करे और किसानों को मानसून की अनिश्चितता के भरोसे न छोड़ दे।