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गन्ना फेडरेशन की अखिल भारतीय बैठक: संगठन की मजबूती और किसानों की समस्याओं पर आन्दोलन का फैसला

गन्ना फेडरेशन की अखिल भारतीय बैठक: संगठन की मजबूती और किसानों की समस्याओं पर आन्दोलन का फैसला

अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध ऑल इंडिया शुगरकेन फार्मर्स फेडरेशन (एआईएसएफएफ) की राष्ट्रीय समिति की 27 जुलाई को नई दिल्ली में हुई बैठक में समस्याओं पर केन्द्रित चर्चा के बाद फैक्टरी आधारित आंदोलन संगठित करने का फैसला लिया गया। अक्टूबर से शुरू होने वाले नये गन्ना पिराई सीजन से पहले हुई इस बैठक में देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों से फेडरेशन की राष्ट्रीय समिति के सदस्य शामिल हुए। यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण थी कि हाल ही में केन्द्र सरकार ने छः दशक से चले आ रहे गन्ना किसान (नियन्त्रण) आदेश 1966 के स्थान पर गन्ना (नियन्त्रण) आदेश 2026 का मसौदा जारी किया था जिसे गन्ना किसानों के भारी विरोध के कारण उसे वापस लेना पड़ा।

भाजपा सरकार ने भले ही अभी प्रस्ताव को वापस ले लिया हो पर उसकी इस कवायद ने यह साफ कर दिया है कि अपनी नीति के अनुरूप यह सरकार पूरी ताकत से निजी कॉरपोरेट के साथ है, गन्ना किसानों के साथ नहीं। इसलिए वापस लिये गये नये गन्ना (नियन्त्रण) आदेश 2026 के मसौदे में गन्ने से इथनॉल व अन्य सह उत्पादों के उत्पादन को कानूनी संबल प्रदान करने, गन्ने के मूल्य को तय करने के लिए रिकवरी रेट को 9.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10.24 प्रतिशत करने और गन्ने के मूल्य को सीधे चीनी की कीमतों से जोड़ दिया गया था और यह व्यवस्था की गई थी कि यदि चीनी मिलों को वित्तीय घाटा होता है तो राज्य सरकार की अनुमति से गन्ने के मूल्य में कटौती की जा सकती है। इसमें चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के भारी भरकम बकायों, सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों की खराब स्थिति, बंद मिलों को पुनः चालू करने, घटतौली और अनाप-पनाप कटौतियों के बारे में या तो चुप्पी साध ली गयी या 1966 के गन्ना (नियन्त्रण) आदेशों को यथावत रख लीपा-पोती की कोशिश की गयी। ऑल इंडिया शुगरकेन फार्मर्स फेडरेशन ने मसौदे का पुरजोर विरोध करते हुए इसे वापस लिए जाने और एक किसान हितैषी गन्ना (नियन्त्रण) आदेश लागू करने की मांग की थी। इस बीच भाजपा सरकार ने गन्ना किसानों के साथ नये सीजन के लिए गन्ने के मूल्य (एफआरपी) में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करने का मज़ाक भी कर दिया।

घटनाक्रम की इस पृष्ठभूमि में गन्ना फेडरेशन की बैठक में गन्ना किसानों की समस्याओं चर्चा के केन्द्र में रही। यह सामने आया कि कई राज्यों में बड़ी संख्या में चीनी मिलें बंद हैं। इनमें अधिकतर सहकारी क्षेत्र व सरकारी क्षेत्र की मिलें हैं। इनमें से कई मिलों पर किसानों का बकाया है। चुनावों आदि के समय सत्तारूढ़ दल के नेता इन्हें चालू करवाने का लुभावना मगर झूठा वादा करते हैं। परन्तु परिणाम कुछ नहीं। गन्ना फेडरेशन ने बंद मिलों को चालू करवाने के लिए जारी आंदोलनों में शामिल होने, उनकी अगुवाई करने का निर्णय लिया है।

उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र देश के दो सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों के कई इलाकों में तो राजनीति में भी गन्ने की बड़ी भूमिका है। इन राज्यों में भी सहकारी चीनी मिलों की हालत खराब है। अधिकतर मामलों में सहकारिता के नाम पर निजी स्वार्थ और नौकरशाही हावी है। इन मिलों के प्रबंधन व अन्य निकायों में जनवादी चुनाव प्रक्रिया का अभाव है जिसके चलते वास्तविक मध्यम व छोटे गन्ना किसान जो पारिवारिक श्रम पर आधारित खेती करते हैं और बीज व उर्वरकों के लिए चीनी मिलों पर निर्भर रहते हैं, सहकारी मिलों की सुविधाओं से दूर धकेले जा रहे हैं। गन्ना फेडरेशन ने देशभर में सहकारी चीनी मिलों की समस्याओं को लेकर सरकार की नीति से लेकर जमीनी स्तर पर मिल आधारित रोजमर्रा की समस्याओं को गंभीरता से उठाने का फैसला किया है।

गन्ना फेडरेषन ने अपनी बैठक में गन्ने के मूल्य की भी समीक्षा की और उत्पादन लागत को देखते हुए इसे नाकाफी पाया। फेडरेषन ने गन्ने का मूल्य तय करने के लिए रिकवरी रेट को 9.5 प्रतिषत रखने, राज्य सरकारों द्वारा घोषित राज्य परामर्ष मूल्य (एस ए पी) की व्यवस्था को बरकरार रखने के साथ गन्ने का मूल्य 550 रूपये प्रति क्विंटल किये जाने की अपनी मांग को दोहराते हुए इसे देषभर में उठाने का भी फैसला लिया। बैठक में सामने आया कि चूंकि भाजपा सरकार की नीति गन्ना किसानो के खिलाफ है इसलिए जहां उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है, वहीं आमदनी नहीं बढ़ रही है। परिणामस्वरूप तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तरप्रदेष आदि प्रदेषों के कई हिस्सों में गन्ने की फसल का रकबा सिकुड़ रहा है। समझने की बात यह है कि यह स्थिति सरकारों की चिंता का सबब नहीं है। इसे रोकने के लिए गन्ना किसानों को ही एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।

कई प्रदेषों से सीज़न षुरू होने पर कई मिलों के समय पर पिराई न करने और सीज़न में समय से पहले पिराई बंद कर देने, तोल में गड़बड़ी, अनाप-षनाप कटौती, परिवहन का खर्च किसानों के हिस्से आने, फसल में कीड़े लगना, उर्वरकों व दवाओं के भारी इस्तेमाल, नकली दवाओं आदि की समस्यायें भी बैठक में सामने आयीं। इनके बारे में किसानों के बीच जागरूपता पैदा करने और मिलकर लड़ने की जरूरत को रेखाकिंत किया गया।

गन्ना फेडरेषन के संगठन को मजबूत करने के लिए तमिलनाडु का अनुसरण कर मिल/फैक्टरी आधारित गन्ना फेडरेषन की कमेटियां गठित कर सदस्यता को बढ़ाने पर जोर दिया गया।

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