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बिहार को योगी का उत्तरप्रदेश बनाने की कोशिश तेज

बिहार को योगी का उत्तरप्रदेश बनाने की कोशिश तेज

जैसी की आशंका थी बिहार विधान सभा चुनाव में जीत के तुरन्त बाद मोदी सरकार अपने एजेंडे पर खुलकर आ गयी । मज़दूर विरोधी चार श्रम संहितायें लागू कर दी गयी, बिजली विधेयक, बीज विधेयक लाने के साथ मनरेगा कानून को भी खत्म कर दिया गया। मगर बिहार में तो जैसे मोदी-नितीश जनता पर टूट ही पड़े ।  नई सरकार के बनते ही  बुलडोजर राज स्थापित कर दिया है। विकास और सुशासन का दावा करने वाली सरकार अब बिहार में कानून से ऊपर उठकर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार की तर्ज पर बुलडोजर संस्कृति को स्थापित कर रही है। एक तरफ जहां राज्य में बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सरकार विफल रही है, वही दूसरी ओर गरीबों, असहायों के घरों पर बुलडोजर चलाकर लोगों  को आतंकित कर रही है। विकास और सुशासन के नाम पर सिर्फ विनाश और कुशासन ही दिखाई देता है।


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भारत के सभी नागरिकों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि बिना नोटिस, कानूनी प्रक्रिया और वैकल्पिक व्यवस्था किये  किसी का घर नहीं तोड़ा जा सकता, यह असंवैधानिक है।  इस सबके बावजूद बिहार में सभी संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देषों को ताक पर रखकर अतिक्रमण के नाम पर गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाये जा रहे हैं। बुलडोजर अभियान के पहले चरण में राजधानी पटना समेत सभी  छोटे-बड़े शहरों में रोज कमाने खाने वाले लाखों परिवारों की छोटी –छोटी दुकानों, ठेला पर रखकर सामान बेचने वालों के  ठिकानों एवं शहर के अगल-बगल गंदी बस्तियों में रह रहे अति गरीबों की झोपड़ियों को पूरी तरह से ध्वस्त किया जा रहा है। अब तो ग्रामीण इलाकों में भी  दसियों वर्षों से रह रहे दलितों, महादलितों के घरों, बस्तियों को उजाड़े जाने की खबरें भी आने लगी हैं  ।


अधिकांश  जगहों से गरीब, दलित, बेसहारा महिलाओं की रोती-बिलखती आवाज गूँज रही है कि ‘‘इस भीषण शीतलहर में अपने छोटे-छोटे बच्चों, बीमार बुढ़े बुर्जुगों को लेकर कहां जायेगें और कहां रहेगें ? कैसे जिन्दा रहेंगे ? लेकिन सरकार को  इस तरह के सवालों की कोई परवाह नहीं है। कई जगहों पर जबरदस्त प्रतिरोध की खबरें भी आयी हैं।


सरकार के सामंती पूंजीवादी वर्ग चरित्र के अनुरूप सामन्तों, ग्रामीण अमीरों, भूमि मफियाओं, अपराधियों एवं दबंगों द्वारा किये गये अतिक्रमण के तहत अवैध निर्माण, सिलिंग, भूदान और गैर मजरूआ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा से खाली कराने के नाम पर बुलडोजर खामोश है। दरभंगा-मधुबनी में जहां सैकड़ों सार्वजनिक पोखरों पर अधिक्रमण कर आलीशान मकान बना लिये गये, वहां बुलडोजर पहुंचने में न सिर्फ परहेज करता है बल्कि परोक्ष रूप से उसकी हिफाजत करता है।


ध्यान रहे कि बिहार सरकार द्वारा 2006 में गठित डी. बंधोपाध्याय भूमि आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक कुल 22 लाख परिवार भूमिहीन  और 5.84 लाख परिवार गृह विहीन हैं। उसने गृहविहीन परिवारों को 10-10 डिसमिल जमीन वास-अवास के लिए देने की सिफारिश की थी। आयोग के मुताबिक ही भूदान की 1,14,708 एकड़ जमीन वितरण के लिये बची हुई है, जिसे या तो दानकर्ताअपने पास रखे हुए हैं या भूमाफियाओं ने इसे हड़प लिया है। भूमि आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि सीलिंग कानून में कुछ संसोधन कर उसे सख्ती से लागू करने से सभी  भूमिहीनों को खेती के लिये भी एक-एक एकड जमीन दी जा सकती है। लेकिन राज्य सरकार ने सामंतों और भू माफियों के दबाव में भूमि आयोग के सुझाव को ठ़ड़े बस्ते में डाल दिया। बिहार में भूमि का सवाल सबसे महत्वपूर्ण रहा है। भूमि सुधार के नाम  सिर्फ खानापूर्ति की गई। वासगीत कानून के तहत गृह विहीनों को वासभूमि और वासगीत का पर्चा देकर उन्हें कानूनी अधिकार देने के बदले उल्टे उजाड़ा जा रहा है। सीलिंग कानून के तहत भी जो ज़मीन अधिशेष – सरप्लस –  थी,  उसे गरीबों  में वितरित करने में सरकार की विफलता स्पष्ट है। सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिये भूमि सुधार अति आवशयक  है। बिहार का विकास और गरीबी से मुक्ति तभी संभव होगी जब भूमिहीनों के बीच ज़मीन वितरित की जायेगी ।


बिहार में प्रति वर्ष भयंकर बाढ़ में हजारों घर पानी की धार में बह जाते हैं। सरकार बाढ़ से हुए विस्थापित परिवारों के लिए पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं करती है। नतीजन लाखों की संख्या में बाढ़ प्रभावित विस्थापित परिवार बांध, सड़क किनारे और तालाबों के अगल-बगल सरकारी ज़मीन में झोपड़ियां बनाकर सदियों से रहते आये हैं। अब उन्हें यहाँ से भी उजाड़ा जा रहा है तो आखिर वे जायेंगे कहा? सरकार के पास उनके पुर्नावास की कोई योजना नहीं है। नीति आयोग के अनुसार बिहार सर्वाधिक गरीबी और कुपोषण वाला राज्य है। जाति आधारित गणना की रिपोर्ट के मुताबिक 94 लाख परिवार की मासिक आमदनी मात्र 6 हजार रूपये से भी कम है। नतीजन केन्द्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार से पलायन करने वालों की रजिस्टर्ड संख्या 2 करोड़ 80 लाख है। ऐसी हालत में जमीन खरीदकर गरीब, दलित अपने बूते अवास का निर्माण करें, ये संभव ही नहीं है।


बिहार विधान सभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत के अंहकार में सरकार ने गरीबों पर चौतरफा  हमला बोल दिया है। सरकारी ज़मीनों पर से कथित  अतिक्रमण हटाने के नाम पर बड़े पैमाने पर बुलडोजर एक्शन शुरू  करने का एलान किया है। 2024 में ही विधान सभा से क्राइम कंट्रोल बिल पारित करवा लिया गया, जिसे बुलडोजर कानून कहा जाता है। इसमें जिला कलेक्टर को सीधे वारंट जारी करने और अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का अधिकार दिया गया है। अब नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया भी 15 दिनों की जगह मात्र 5 दिन ही सीमित कर दी गयी है। इसके अतिरिक्त घर ध्वस्त करने के लिए 500 से 10 हजार रूपये जुर्माना भी देना होगा। इस अभियान के लिए पुलिस, प्रशासन की ओर से उड़नदस्ता और सख्ती के लिए एक अलग से बुलडोजर पुलिस दस्ता गठित करने के लिए 153 पदों की स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है।


दूसरी तरफ योजना एवं परियोजना के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण में अचानक तेज़ी आ गयी है। चुनाव से ठीक पहले भागलपुर के पिरपैंती में मात्र 1 रूपया में 1050 एकड़ जमीन गौतम अडानी को लीज पर दे दी गयी। अभी तक करीब दस लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि को अधिग्रहण किया जा चुका है। जमीन अधिग्रहण कानून 2013 के सभी प्रावधानों के विपरीत बिना सहमति और बिना मुआवजा भुगतान किये ही जमीने हड़पी जा रही हैं । सभी जगहों पर बुलडोजर कृषि भूमि को रौंदते नजर आ रहे हैं। वही भूमि मालिक अपने अधिकारों और मांगों को लेकर प्रशासन के सामने लाचार महसूस कर रहे हैं। प्रतिरोध बढ़ने पर दमनात्मक कार्यवाहियों से लोगों की आवाज भी दबा दी जा रही है।  


देश की राजनीति में सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण चेहरा रहे नीतिश  कुमार का वैचारिक दिवालियापन उजागर हो गया है। अवसरवादी राजनीति में माहिर नीतिश  कुमार आज, सामाजिक न्याय की धारा से अलग होकर बीजेपी, आरएसएस के गोद में जा बैठे हैं। नतीजा यह है कि सामाजिक न्याय के प्रति संवेदनशील बिहार को योगी के उत्तरप्रदेश की स्थिति में पहुंचाया जा रहा है ।


बिहार विधान सभा के चुनाव नतीजे के बाद  10वीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेना नितीश कुमार के लिए गर्व   गौरव की बात हो सकती है, लेकिन यह भाजपा है जो  दिखावे का मुकुट उन्हें पहना कर  कारपोरेट सांप्रदायिक नीतियों के एजेंडे को बिहार में भी आगे बढ़ाने के लिए पूरी ताकत से प्रयास कर रही है। बिहार से ही नितिन नबीन को बीजेपी का कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पीछे भी बीजेपी की यही राजनीति है।


बीस वर्ष के कार्यकाल मे  इस बार नितीश कुमार सबसे कमज़ोर मुख्यमंत्री के रूप में नजर आ रहे हैं। सरकार पर अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की पकड़ सबसे मजबूत हो गयी है। सरकार में सबसे ज्यादा मंत्री, दो उपमुख्यमंत्री और विधान सभा का अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद भी भाजपा के पास हैं। यहां तक कि पहली बार गृह विभाग और राजस्व विभाग दोनों भाजपा के उप मुख्यमंत्री के पास ही है।
सत्ता का बुलडोजर गरीबों की हिम्मत को नहीं तोड़ सकता है। सीलिंग,  भूदान और गैर मजरूआ सरकारी जमीन पर बसे गरीबों के हकों की लड़ाई लड़नी होगी। बुलडोजर आतंक पर तुरन्त रोक लगाने, बिना वैकल्पिक व्यवस्था उजाड़ने की कार्यवाही पर रोक लगाने, बसे हुए गरीब परिवारों को वासगीत का पर्चा (कानूनी हक) देने और डी. वंधोपाध्याय भूमि आयोग की सिफारिषों को लागू करने की मांगों पर एक मज़बूत जन प्रतिरोध तेज करना पड़ेगा।

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