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पश्चिम बंगाल किसान सभा के 38वें राज्य सम्मेलन
बंगाल में किसान संघर्षों का इतिहास 1936 में किसान सभा के गठन से बहुत पहले का है। 1793 के स्थायी बंदोबस्त (परमानेंट सेटलमेंट) के बाद से ही किसानों को भीषण शोषण का सामना करना पड़ा। भूमि राजस्व लगातार बढ़ता रहा—1790 से 1880 के बीच यह दोगुने से भी अधिक हो गया। इसके परिणामस्वरूप बंगाल मे अकाल जैसी त्रासदियाँ हुईं और संन्यासी–फकीर विद्रोह, संथाल विद्रोह तथा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जैसे जनविद्रोह हुए।
1883 के बंगाल टेनेंसी एक्ट के बावजूद कृषि संकट ख़त्म नहीं हुआ। 1929–33 के आर्थिक संकट के दौरान यह और ज्यादा गहरा गया। राजनीतिक बंदियों की रिहाई के बाद 31 मार्च 1934 को बंकिम मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संगठनिक कमिटी गठित की गई और इसके बाद 1937 में बंगाल प्रांतीय कृषक समिति का पहला सम्मेलन आयोजित हुआ। तब से किसान सभा की बंगाल राज्य इकाई ने एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है।
किसान सभा की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई, पश्चिम बंगाल प्रादेशिक कृषक समिति का 38वां सम्मेलन 7–9 नवंबर 2025 को बर्धमान के रवीन्द्र भवन में आयोजित हुआ। सम्मेलन में 29 महिलाओं सहित कुल 563 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। स्वागत समिति के अध्यक्ष और कल्याणी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अरविंद दास ने प्रतिनिधियों का स्वागत किया। किसान सभा के महासचिव विजू कृष्णन द्वारा सम्मेलन का उद्घाटन किया।
बर्धमान के उत्सव मैदान में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई, जिसमें हजारों पुरुष व महिला किसान बड़े-बड़े जुलूसों के साथ शामिल हुए। विजू कृष्णन, हन्नान मोल्ला, अमल हालदार और सैयद हुसैन ने जनसभा को संबोधित किया। बिप्लब मजूमदार ने इस सभा की अध्यक्षता की।

सम्मेलन के प्रतिनिधि सत्र के दौरान राज्य के किसानों के सामने मौजूद अनेक संकटों पर चर्चा हुई। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार के 14 वर्षों के कुशासन ने किसानों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह नुकसान पहुँचाया है। एक ओर जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने किसानों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को तबाह किया है। दूसरी ओर, सरकार ने विभिन्न साम्प्रदायिक ताकतों के साथ समझौते किए हैं, जिससे समाज में साम्प्रदायिक ज़हर फैलता जा रहा है। भाजपा भी यही कर रही है। जनवादी अधिकारों पर गंभीर हमला हो रहा है और कॉरपोरेट लूट बेलगाम है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अभूतपूर्व लूट और भ्रष्टाचार है। विकास कार्य ठप पड़े हैं और सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े अपराधी तत्व आवास योजना, मनरेगा, आदिवासी विकास जैसी योजनाओं के पैसों की बड़े पैमाने पर हेराफेरी कर रहे हैं, जिससे ये योजनाएँ खोखली हो गई हैं।
राज्य मे कृषि गहरे संरचनात्मक संकटों से जूझ रही है, जिसे केंद्र सरकार के हस्तक्षेप ने और गंभीर बना दिया है, जबकि संविधान के अनुसार कृषि राज्य सूची का विषय है। उर्वरकों की भारी कमी है। सार्वजनिक संस्थानों सेऋण लगभग न के बराबर मिल पा रहा है, जबकि माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का जाल किसानों का अभूतपूर्व शोषण कर रहा है। धान और आलू—जो इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें हैं— उचित सरकारी खरीद की व्यवस्था के आभाव में गंभीर संकट मेहै। किसान निजी एजेंटों को अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर हैं, जो लाभकारी के जगह लूटकारी मूल्य निर्धारण करते हैं। कृषि विस्तार सेवाएँ अपर्याप्त हैं और कृषि अनुसंधान एवं विकास में निवेश के लिए संसाधन भी नाकाफी हैं।जलवायु संकट के कारण बार-बार आने वाली बाढ़ ने कृषि को भारी नुकसान पहुँचाया है, इस पर राज्य सरकार द्वारा दियें जाने वाला बेहद कम या कई मामलों में शून्य मुआवज़े ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। उत्तर बंगाल के जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। बड़ी नदियों के कटाव से तेज़ी से भूमि नष्ट हो रही है, जिसे नदी तटों से अवैध रेत खनन करने वाले रेत माफिया और बढ़ा रहे हैं।
राजमार्गों, खनन परियोजनाओं और चाय बागानों के पट्टों के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हो रहा है। वाम मोर्चा सरकार द्वारा वितरित की गई भूमि से छोटे किसानों को बेदखल किया जा रहा है। हज़ारों पट्टे—जो भूमिहीनों को दिए गए थे—नए भूमि माफिया और सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा छीने जा रहे हैं। पुलिस और प्रशासन पूरी तरह इनमाफियाओं के साथ हैं और किसानों के खिलाफ खड़ा हैं।
इन हमलों का मुकाबला करने के लिए किसानों के एक व्यापक प्रतिरोध आंदोलन की आवश्यकता है। वास्तव में संघर्ष जारी हैं और इन हमलों का प्रतिरोध हो रहा है। सैकड़ों बड़े प्रदर्शन, ज्ञापन, रैलियाँ, रास्ता रोको और घेराव हर रोज़ आयोजित किए जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों और पुलिस द्वारा फैलाए गए आतंक का कुछ हद तक मुकाबला हुआ है, लेकिन यह अभी भी पर्याप्त नहीं है। प्रतिनिधियों की चर्चा वस्तुनिष्ठ और आत्मालोचनात्मक रही।
प्रतिनिधियों का यह मानना था कि अधिकांश संघर्ष नियमित प्रकृति के थे। कई संघर्ष केवल निर्णयों के कार्यान्वयन तक सीमित थे, न कि उग्र प्रतिरोध। हमारी मांगों, बुनियादी राजनीति और बयानों ने कुछ हद तक ही प्रचार को निचले स्तर तक पहुँचा, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। कार्यकर्ताओं को सक्रिय और उत्साहित करने के लिए अधिक गहन अभियानों की आवश्यकता है। कॉरपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्रीय आह्वान और संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वानों को जनता तक गंभीरता से पहुँचाया गया, लेकिन इन मुद्दों पर पर्याप्त कार्रवाई दिखाई नहीं दी।
पट्टाधारकों की बेदखली के खिलाफ बड़ेपैमाने पर अच्छे आंदोलन हुए। कई मामलों में भूमि कब्जा रोका गया और जमीन किसानों ने वापस मिली। भूमि संघर्षों का यह बढ़ता रुझान सकारात्मक है। लेकिन राज्य स्तरीय भूमि सम्मेलन अभी तक नहीं हो पाया है। पूरे क्षेत्र में भूमि संघर्ष को समन्वित और विस्तारित करने के लिए इसे जल्द से जल्द आयोजित करना आवश्यक है।
फसल-आधारित आंदोलन विशेष रूप से आलू की फसल पर चलाए गए। लगभग 80 स्थानों पर कीमतों के मुद्दे पर बड़े प्रदर्शन हुए, राष्ट्रीय राजमार्गों को रोका गया और कई मंडी संघर्ष हुए। इसी तरह सब्जियों की बेहतर कीमत के लिए रास्ता रोको किए गए। जूट की लाभकारी कीमत की मांग को लेकर कई रैलियाँ की गई और प्रशासनिक कार्यालयों में ज्ञापन दिए गए। इन संघर्षों के अलावा दुग्ध उत्पादकों कासफल राज्य सम्मेलन हुआ, इसमें अच्छी सदस्यता हुई और भविष्य के आंदोलन की योजना बनाई गई। राज्य स्तरीय पान उत्पादक संघ कई वर्षों से काम कर रहा है और बड़े व्यापारियों द्वारा नियंत्रित बाज़ार में कीमतों के मुद्दे से जूझ रहा है। रेशम और तसर किसानों की समितियाँ कुछ जिलों में गठित की गई हैं और उन्होंने इस क्षेत्र में सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष की योजना बनाई है। कुछ जिलों में फूलों की खेती बड़े पैमाने पर हो रही है और फूल उत्पादन क्षेत्र बढ़ रहा है, लेकिन यहाँ भी किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा। इसलिए फूल चासी उप समिति का गठन किया गया है, जो फूल उत्पादकों के बीच काम कर रही है।
सफलता के लिए अधिक तीखे संघर्षों की आवश्यकता है। आलू, जूट और सब्जियों जैसी फसलों पर कई सम्मेलन हुए, लेकिन उन मांगों और साथ ही किसानों की अन्य मांगों—जैसे अपर्याप्त सिंचाई ढांचा, भूमि कटाव, चक्रवात से नुकसान, बाढ़ नियंत्रण, सूखा राहत, स्मार्ट मीटरों पर ठोस कार्रवाई की जरुरत है।
जमीनी स्तर तक व्यापक अभियान के बाद 20 अप्रैल 2025 को ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान में 10 लाख लोगों की एक विशाल मजदूर-किसान रैली आयोजित की गई। इसने किसानों और मजदूरों में जबरदस्त हौसलापैदा किया और राज्य में वर्गीय संगठनों के संयुक्त संघर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। इसने मजदूर-किसान एकता को मजबूत किया।
तृणमूल सरकार ने सहकारी संस्थाओं से बेतहासा धन की लूट कर उन्हें लगभग नष्ट कर दियाहै। व्यावहारिक रूप से सहकारी ऋण व्यवस्था औसत किसान के जीवन से गायब हो चुकी है। इसके स्थान पर माइक्रोफाइनेंस संस्थान और चिट फंड सक्रिय हो गए हैं। हमें इसके विरुद्धसंघर्ष करना होगा और सहकारी आंदोलन को पुनर्जीवित करना होगा।
मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष का मुद्दा भी चर्चा में रहा। कभी-कभी जंगली हाथियों के हमले होते हैं; इसके अलावा उत्तर बंगाल में जंगली सूअर, मोर और अन्य पक्षी धान और मक्का की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाते हैं। सुंदरबन डेल्टा में बाघों के हमलों से मानव जीवन भी खतरे में है। किसानों और उनकी आजीविका की रक्षा में सरकार की भूमिका नगण्य रही है।
सम्मलेन में संगठनात्मक गतिविधियों पर भी चर्चा हुई। सभी स्तरों पर समिति के कामकाज में सुधार हुआ है, लेकिन प्रतिनिधियों ने जमीनी स्तर पर संगठन और आंदोलन के निर्माण के लिए राज्य व जिला नेतृत्व द्वारा अधिक ध्यान दिए जाने की मांग की है। सदस्यता नामांकन के तुरंत बाद इकाई सम्मेलन आयोजित करने और इकाइयों के पंजीकरण में सुधार हुआ है, लेकिन इकाइयों के कामकाज में कमजोरी अब भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है। इस पर अधिक ध्यान और योजना की आवश्यकता है।
राज्य स्तरीय संयुक्त किसान मोर्चा की गतिविधियाँ भी बेहतर हो रही हैं। किसान सभा की राज्य समिति नियमित रूप से बैठक कर एसकेएम के आह्वानों के कार्यान्वयन की योजना बनाती है। किसान सभा को राज्य में एसकेएम को मजबूत करने के लिए और अधिक जिम्मेदारी लेनी होगी। सम्मेलन के दौरान एक विशेष एसकेएम सत्र आयोजित हुआ। लगभग 25 संगठन राज्य एसकेएम के सदस्य हैं, हालांकि उनमें से कई बहुत छोटे हैं और सीमित क्षेत्रों तक ही सक्रिय हैं। बड़े राज्य स्तरीय संगठनों के नेता इस विशेष सत्र मेंशामिल हुए, उन्हें सम्मानित किया गया और उन्होंने मंच सेएसकेएमको और मजबूत करने का आह्वान किया।
संगठन की वित्तीय स्थिति पर भी चर्चा हुई। नियमित रूप से धन संग्रह किया जा रहा है और केंद्रीय कोटादिया गया है, लेकिन प्रत्येक प्राथमिक इकाई से 100 रुपये संग्रह का लक्ष्य पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। खातों का रख-रखाव ठीक से किया जा रहा है और उनका ऑडिट होता है। सम्मेलन के दौरान केंद्रीय कार्यालय भवन कोष के लिए अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव को 5 लाख रुपये दिए गए।
अंत में, सम्मेलन ने सर्वसम्मति से नए नेतृत्व का चुनाव किया। 162 सदस्यीय राज्य परिषद और 66 सदस्यीय राज्य समिति का गठन किया। पहली राज्य समिति बैठक में 22 सदस्यीय राज्य सचिवालय चुना गया। परेश पाल को सचिव, मेघनाद भुइयां को अध्यक्ष और आलोक भट्टाचार्य को कोषाध्यक्ष चुना गया। सम्मेलन अत्यंत हौसले और उत्साह के साथ संपन्न हुआ।