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युवा भारत का आक्रोश: शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ उभरता प्रतिरोध
देश की मौजूदा सामाजिक-आर्थिक स्थिति उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। पिछले 12 वर्षों से आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के शासन में देश के छात्र और युवा सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
जून-जुलाई के महीने में जंतर-मंतर पर जो कुछ घटित हुआ, वह केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत मिश्रा द्वारा की गई “कॉकरोच” या “परजीवी” वाली टिप्पणी की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि यह लंबे समय से चली आ रही “युवा भारत” की हताशा और आक्रोश का विस्फोट था, जिसे इंटरनेट की भाषा में प्यार से “जेन-ज़ी” कहा जाता है। 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा का एजेंडा स्पष्ट था—शिक्षा का “केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकीकरण”। इसके तहत ही बाद के वर्षों में शिक्षा के व्यावसायीकरण और केंद्रीकरण के लिए कई कठोर कदम उठाए गए—परीक्षा प्रणाली उनमें से एक थी। वर्ष 2017 में सरकार ने राष्ट्रीय स्तर की सभी परीक्षाएँ आयोजित करने के लिए एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) की स्थापना की और धीरे-धीरे पहले से चली आ रही विकेंद्रीकृत व्यवस्था को समाप्त कर दिया।
मई 2026 में नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी एंड एंट्रेंस टेस्ट) का पेपर लीक हुआ, जिससे लगभग 22 लाख अभ्यर्थी प्रभावित हुए। खबर ऑनलाइन सामने आते ही एन टी ए ने तत्काल पुनः परीक्षा कराने की घोषणा कर दी। वर्ष 2024 में भी नीट का पेपर लीक होने के बाद इसी तरह की स्थिति पैदा हुई थी। इसके कुछ दिनों बाद मुख्य न्यायाधीश ने छात्रों और युवाओं को “कॉकरोच” और “परजीवी” कहा, जिसकी समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक आलोचना हुई। इन सभी घटनाओं ने युवा पीढ़ी के भीतर गुस्से और निराशा को और गहरा कर दिया। सवाल यह था कि कोई व्यवस्था इतनी असंवेदनशील कैसे हो सकती है कि अपनी ही गलती का दोष उस युवा आबादी पर डाल दे, जिसकी इसमें कोई गलती नहीं है।
पेपर लीक के खिलाफ यह आंदोलन परीक्षाओं के अत्यधिक केंद्रीकरण, पारदर्शी व्यवस्था के अभाव और कोचिंग माफिया के व्यावसायिक रवैये का परिणाम है, जिसका एकमात्र उद्देश्य छात्रों की जेब से अधिक से अधिक पैसा निकालना रह गया है। जब परीक्षा व्यवस्था छात्रों की क्षमता और प्रतिभा को परखने का माध्यम न रहकर केवल पैसा कमाने की प्रक्रिया में बदल जाए, तो ऐसी अराजकता पैदा होना स्वाभाविक है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एन टी ए) द्वारा आयोजित लगभग 80 परीक्षाओं को तकनीकी खामियों, पेपर लीक या किसी न किसी प्रकार की कुप्रबंधन की वजह से दोबारा आयोजित करना पड़ा है। उच्च शिक्षा मंत्रालय सहित संबंधित अधिकारियों द्वारा ऐसी गलतियों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, जिसके चलते कुप्रबंधन अब व्यवस्था का सामान्य हिस्सा बनता जा रहा है।
जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन नीट अभ्यर्थियों को न्याय दिलाने और ऐसी अन्यायपूर्ण एवं असंवेदनशील व्यवस्था के कारण अपनी जान गंवाने वाले 22 छात्रों के लिए न्याय की मांग से शुरू हुआ था। इसका सबसे महत्वपूर्ण सवाल था—व्यवस्था में जवाबदेही वापस कैसे लाई जाए। लेकिन इस आंदोलन ने हमारे देश के छात्रों और युवाओं की कठोर वास्तविकताओं को भी उजागर किया। आंदोलन में शामिल छात्रों के एक बड़े हिस्से को राज्य स्तर पर आयोजित राज्य सिविल सेवा परीक्षाओं और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित अन्य भर्ती परीक्षाओं में होने वाले पेपर लीक और कुप्रबंधन का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए जंतर-मंतर पर चला 37 दिनों का आंदोलन केवल नीट अभ्यर्थियों और आत्महत्या करने वाले छात्रों की पीड़ा को सामने लाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर भी समाज के सामने रखी।
पुलिस की बर्बरता, सरकार की निगरानी, एफ आई आर और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के बावजूद यह आंदोलन छात्रों और युवाओं के बीच एकजुटता का मंच बन गया। “कभी हार न मानने” वाले युवा भारत के इस जुझारूपन ने एक ऐसे भविष्य की उम्मीद जगाई है, जिसमें शिक्षा एक बार फिर युवाओं के बीच केंद्रीय मुद्दा बनेगी। इस आंदोलन ने यह उम्मीद भी जगाई है कि इस पीढ़ी के छात्र केवल भगत सिंह और आंबेडकर के चित्र हाथों में लेकर खड़े नहीं होते, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन और संघर्ष में उतारते भी हैं।