Magazine

एथेनॉल प्लांट के खिलाफ जन संघर्ष की ऐतिहासिक जीत

एथेनॉल प्लांट के खिलाफ जन संघर्ष की ऐतिहासिक जीत

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी  क्षेत्र के लोगों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कृषि, आजीविका और पर्यावरण को कॉरपोरेट ताकतों के हमले से बचाने के लिए जन संघर्ष कितना निर्णायक होता है। यह सिर्फ एक प्रदूषणकारी उद्योग के खिलाफ स्थानीय संघर्ष नहीं रहा, बल्कि अखिल भारतीय किसान आंदोलनों और कृषि के कॉरपोरेटीकरण के खिलाफ लड़ रहे तमाम तबकों के लिए प्रेरणा बना। यह भाजपा-एनडीए के नेतृत्व वाली “डबल इंजन सरकारों” को एक सशक्त जवाब है कि जनता की ताकत अंततः किसी भी राज्य दमन को परास्त कर सकती है।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी  तहसील में 10 दिसंबर 2025 को राठी खेड़ा और आसपास के गांवों के किसानों पर पुलिस द्वारा बर्बर हिंसा की गई। किसान, दो से चार फसल देने वालीउपजाऊ कृषि भूमि पर एथेनॉल प्लांट लगाए जाने का विरोध कर रहे थे। अप्रैल 2024 से चल रहे 17 महीने लंबे धरने के बावजूद राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, जिसके चलते लगभग 10,000 लोग – जिसमे मुख्यतः किसान थे –  महापंचायत के लिए इकठ्ठा हुए।

यह पूरा क्षेत्र घग्गर नदी के किनारे स्थित है, जो वर्षा आधारित, मौसमी नदी है और बाढ़ व पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए जानी जाती है। यह इलाका राजस्थान के गिने-चुने हरे-भरे क्षेत्रों में से एक है, जहां किसान साल में दो से चार फसलें उगाते हैं और पशुपालन के लिए भी मुफ़ीद हैं। यह क्षेत्र लाखों लोगों की आजीविका का आधार है। वर्ष 2020 मेंरियल एस्टेट समूहों द्वारा अनाज गोदाम बनाने के नाम पर कुछ किसानों से जमीन खरीदी और बाद में उसे चंडीगढ़ आधारित उद्योगपतियों को बेच दिया। उन्होंने यहाँ एथेनॉल प्लांट निर्माण शुरू किया और स्थानीय रोजगार व विकास के बड़े-बड़े दावे किए।

बाद में यह सामने आया कि यह परियोजना पेट्रोल-डीजल में 20% एथेनॉल मिश्रण (ई20) योजना का हिस्सा है। ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड ने लगभग 62 एकड़ भूमि खरीदी थी। 16 जून 2021 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1320 केएलपीडी क्षमता वाले अनाज आधारित एथेनॉल प्लांट और 40 मेगावाट के को-जेनरेशन पावर प्लांट की अनुमति दी। कंपनी ने इसे “ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज” प्लांट बताया और केंद्र सरकार की एथेनॉल ब्लेंडिंग योजना को समर्थन व स्थानीय रोजगार देने का दावा किया।

यह एशिया के सबसे बड़े एथेनॉल प्लांटों में से एक है — 1320 केएलडी (किलोलीटर प्रतिदिन), यानी प्रतिदिन 13 लाख 20 हजार लीटर एथेनॉल उत्पादन। खाद्यान्न से एथेनॉल बनाने में भारी मात्रा में भूजल की आवश्यकता होती है। एक लीटर एथेनॉल के लिए लगभग 10 से 17 लीटर पानी चाहिए। यानी इस प्लांट को प्रतिदिन लगभग 1.32 करोड़ से 2.24 करोड़ लीटर भूजल निकालना पड़ता। यह क्षेत्र ट्यूबवेल आधारित खेती पर निर्भर है। इतना अधिक भूजल दोहन जलस्तर में गंभीर गिरावट लाएगा। यह “रेड कैटेगरी” उद्योग है, जिससे एसिटाल्डिहाइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसी जहरीली गैसों के कारण कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

शुद्ध एथेनॉल अलग करने के बाद लगभग 90% हिस्सा अपशिष्ट के रूप में बचता है, जिसमें मायकोटॉक्सिन जैसे हानिकारक तत्व होते हैं, जो अनाज, मेवे, सूखे फलों को दूषित कर मानव और पशुओं के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। इसमें भारी धातुएं, बायो-एमाइन्स, आर्गेनिक-एल्डिहाइड व अम्ल, कीटनाशक और जहरीली गैसें शामिल हैं, जो हवा और पानी को प्रदूषित करती हैं। एथेनॉल प्लांट अक्सर इस अपशिष्ट को सस्ते तरीके से भूमिगत कुओं में डाल देते हैं। पंजाब के जीरा में भी ऐसा ही हुआ था, जहां किसानों के आंदोलन के बाद प्लांट बंद करना पड़ा।

40 मेगावाट का को-जेनरेशन पावर प्लांट पराली जलाने पर आधारित है, जिससे जहरीली गैसें निकलेंगी और प्रतिदिन 220 क्विंटल से अधिक राख पैदा होगी। राख के निपटान की कोई उचित व्यवस्था नहीं है, जिससे मिट्टी पूरी तरह जहरीली हो जाती है।

यदि कृषि और औद्योगिक दोनों “वॉटर फुटप्रिंट” को जोड़ा जाए तो एक लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए 2000 से 2600 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत में पर्यावरणीय स्थिरता के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

स्थानीय किसानों ने “एथेनॉल फैक्ट्री हटाओ संघर्ष समिति” के तहत अप्रैल 2024 से आंदोलन शुरू किया। सरकार ने कंपनी से अधिक मुआवजे दिलवाने का आश्वासन देने की कोशिश की, लेकिन किसान अंत तक लड़ने पर अडिग रहे। 25 नवंबर को अंतिम वार्ता तय थी, लेकिन उससे पहले 19 नवंबर को भारी पुलिस बल ने प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

इसके विरोध में 10 दिसंबर को हुई महापंचायत में टिब्बी  तहसील के लगभग 15 गांवों से दसियों हजार लोग पहुंचे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जनता ने प्रतिरोध किया, बैरिकेड तोड़े, फैक्ट्री स्थल में प्रवेश किया और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया। लगभग 70 लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें कम से कम 24 पुलिसकर्मी भी शामिल थे। 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन अंततः पुलिस को पीछे हटना पड़ा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने किसानों पर की गई पुलिस हिंसा की कड़ी निंदा की और संघर्ष को पूरा समर्थन दिया। एसकेएम ने मोदी सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारों पर कॉरपोरेट कंपनियों के हित में किसानों पर हमले करने का आरोप लगाया। एसकेएमने चेतावनी दी कि जनतात्रिक आंदोलनों का दमन और ज्वलंत कृषि मुद्दों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। एसकेएमने उपजाऊ कृषि भूमि के औद्योगिक उपयोग हेतु रूपांतरण की अनुमति न देने की मांग दोहराई और राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार से सभी किसानों की रिहाई, घायलों को मुआवजा तथा संघर्ष समिति से वार्ता की मांग की।

किसानों पर हुई पुलिस हिंसा की पृष्ठभूमि में, हनुमानगढ़ के ट्रेड यूनियनों और सभी मेहनतकश लोगों ने 17 दिसंबर 2025 को अनाज मंडी, हनुमानगढ़ में महापंचायत बुलाई। जिला प्रशासन के कड़े विरोध और इसे रोकने के तमाम प्रयासों के बावजूद, महापंचायत में 15,000 से अधिक लोग एकत्रित हुए। संयुक्त किसान मोर्चा का प्रतिनिधित्व करने वाले दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल इस महापंचायत में शामिल हुए और इसे संबोधित किया। इस के साथ ही ट्रेड यूनियनों, अन्य जन संगठनों के नेताओं और विधायकों सहित व अन्य जन प्रतिनिधियों ने भी महापंचायत को संबोधित किया। सीटू और किसान सभा की संगठित ताकत की इस महापंचायत के सफल आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारी जन-भागीदारी ने ‘डबल इंजन’ वाली राज्य सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया और जिला कलेक्टर को यह सिफारिश लिखने के लिए विवश होना पड़ा कि वे इथेनॉल संयंत्र स्थापित करने के एमओयू पर आगे न बढ़ें और स्थानीय जन आंदोलन के खिलाफ दर्ज सभी लंबित मामलों को वापस लेने के लिए कदम उठाएं। इसके बाद, 20 दिसंबर 2025 को कंपनी ने घोषणा की कि वह इस परियोजना को राजस्थान से बाहर स्थानांतरित कर देगी।

हनुमानगढ़ जिला कलेक्टर ने दिसंबर 2025 में कहा कि प्लांट को भूमि रूपांतरण सहित राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल एवं पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सभी आवश्यक अनुमतियां मिली थीं। लेकिन 2025 के केंद्रीय भूजल प्राधिकरण – सीजीडब्लूए – नियमों के अनुसार, 100 घन मीटर (एक लाख लीटर) प्रतिदिन से अधिक पानी निकालने वाले किसी भी उद्योग को भूजल प्रभाव आकलन रिपोर्ट अनिवार्य है।इस रिपोर्ट की आवश्यकता पानी की निकासी की मात्रा (वॉल्यूम) के कारण उत्पन्न होती है, न कि इस बात से कि उसका निपटान (डिस्पोजल) कैसे किया जाता है। चूँकि टिब्बी प्लांट के लिए अनुमानित जल की आवश्यकता लगभग 60 लाख लीटर/प्रतिदिन से 2.2 करोड़ लीटर/प्रतिदिन थी, जो एक लाख लीटरप्रति दिन की सीमा से कहीं अधिक थी, इसलिए ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (एनओसी) प्राप्त करने के लिए यह मूल्यांकन एक कानूनी अनिवार्यता बन गया था।17 दिसंबर, 2025 को राजस्थान सरकार ने “भूजल संदूषण और कमी के खतरों” की जांच के लिए एक समिति बनाकर स्पष्ट रूप से आगे के अध्ययन की आवश्यकता को स्वीकार किया, जिससे प्रभावी रूप से यह मान लिया गया कि स्थानीय पर्यावरणीय जोखिमों को दूर करने के लिए मानक क्लीयरेंस अपर्याप्त थे। सार्वजनिक जानकारी में ऐसी किसी रिपोर्ट की जानकारी न होना भाजपा-एनडीए की डबल इंजन सरकारों के तहत उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को उजागर करता है।

टिब्बी के किसान अपने स्थानीय संघर्ष को उपजाऊ कृषि भूमि पर कॉर्पोरेट कब्जे के खिलाफ किसानों और मजदूरों के अखिल भारतीय आंदोलन से जोड़ने में सफल रहे। कर्नाटक में देवनहल्ली के किसानों के तीन साल लंबे संघर्ष के बाद, जिसने राज्य सरकार को किसानों की जमीन अधिग्रहण करने के आदेश को रद्द करने के लिए मजबूर कर दिया था, राजस्थान में टिब्बी के किसानों ने मजदूर-किसान एकता के आधार पर जनता को एकजुट करके राज्य के दमन से पार पाने का रास्ता दिखाया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *