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संपादकीय: फूटते आक्रोश: टूटते तटबंध
इतिहास में ऐसे समय आते हैं जब जो काम दशकों में नहीं हो पाता वह कुछ दिनों में हो जाता है । पिछ्ले कुछ दिन और सप्ताह इस बात की ताईद करने वाले दिन और सप्ताह थे । इनमे जो हुआ है वह सचमुच असाधारण, अदभुत और असामान्य है । ज्यादातर लोगों के लिए अप्रत्याशित, अचानक और अनपेक्षित भी है । मगर ऐसा कहना इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि सब्र की भी एक सीमा होती है, मुगालते की भी एक उम्र होती है और बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है । यही हुआ भी : दरिया झूम के उट्ठे और इस कदर उट्ठे कि बड़े जतन से ढाली गयी ढालों से भी नहीं टाले जा सके ।
और अंत में हुआ यह कि हजारों करोड़ रूपये और न जाने कितने करोड़ डॉलर्स खर्च करके कृत्रिम महामानव की छवि गढ़कर जो 56 इंची गुब्बारा फुलाया गया था उसे महज 5 दिन में युवतर भारत – जेन जी – ने जंतर मंतर पर छूमन्तर कर दिया । इससे हतप्रभ और स्तब्ध 56 इंची खुद आंय बांय सांय बोलने लगे । क्या न करें की गति को प्राप्त हो गए । उनके आयोजक – प्रायोजक भी सुट्ट और सन्न रह गए । हाल के इतिहास में यह ऐसी नैतिक पराजय है जिसके सदमे से ढीठता की सारी सीमाओं से परे समझे जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी भी उबर नहीं पा रहे हैं । युवाओं को बहलाने और उलझाने के लिए रात 12 -12 बजे तक रील बानाए जा रहे हैं । अपना ट्रेडमार्क संबोधन भाईयों और भैनों छोड़कर फ्रेंडज तक पर आ रहे हैं । मगर रायता ऐसा फैला है कि समेटे नहीं सिमट रहा ।
युवतर भारत की इस जगार से मोदी ही नहीं, उनका संघी कुनबा भी हैरान और परेशान है । असहमतों, सरकार के विरोध में आवाज उठाने वालों और आन्दोलन करने वालों को देशद्रोही, विदेशी फंडिंग वाले, पाकिस्तान प्रायोजित बताने और हर गतिशीलता के पीछे हिन्दू-मुस्लिम एंगल तलाशने जैसे अपने सारे ब्रह्मास्त्र आजमाने के बाद भी इस बार जो तूफ़ान सा उठा है उसे समझ नहीं पा रहे हैं, इसीलिए उससे सुलझ नहीं पा रहे हैं । स्वयं को सकल ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली भाजपा, पृथ्वी का सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन का दावा करने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और अखिल विश्व के मसले उनसे पूछकर हल किये जाते हैं का दंभ भरने वाले नरेंद्र मोदी सिड़बिड़ाये हुए हैं । कभी नीम नीम कभी शहद शहद की अदा दिखाते हुए आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत की जुंडली भी बिलबिलाये हुए है । वह एक तरफ तो युवाओं को गरिया रही है तो दूसरी तरफ खुद भागवत जी उन्हें सहलाने की कोशिश कर रहे हैं । संघ को पता चल गया है कि इस बार गर्म तवे पर सिर्फ धर्मेन्द्र प्रधान को ही फ्राय नहीं किया गया है : युवाओं ने असली मुजरिम की शिनाख्त भी कर ली है । वे हजारों की तादाद में नागपुर के उसके मुख्यालय का दरवाजा देख भी आये हैं और उसे हिला भी आये हैं ।
भागवत और उनका कुनबा, मोदी और उनका गिरोह यदि लोकतंत्र में विश्वास करने वाले होता तो इससे सबक लेता, चूकों, गलतियों और कमजोरियों को चीन्हता और सर झुकाकर वादा करता कि अब भविष्य में उन्हें नहीं दोहराया जाएगा । भारत की युवा पीढ़ी से उसका भविष्य चौपट करने के लिए खेद जताता । जंतर मंतर पर उसके साथ की गयी बर्बरता के लिए हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता । मगर जिनके डी एन ए – गुणसूत्रों – में ही तानाशाही और फासिज्म हो, उनसे इसकी उम्मीद करना भेड़ियों के शाकाहारी हो जाने का भरम पालना है । यही वजह है कि उसने जो किया वह इससे उलट ही किया ।
एक तरफ संघ प्रमुख कथित रूप से युवा भारत के साथ संवाद का दिखावा कर रहे थे दूसरी तरफ आरएसएस का मुखपत्र ऑर्गनाइज़र इस आन्दोलन से संबद्ध उन कथित ‘विवादित हस्तियों’’ की नामजद सूची जारी कर रहा था , जिन्होंने सीजेपी के आह्वान पर शुरू हुए जंतर-मंतर आंदोलन का समर्थन किया था । 11 लोगों की इस सूची में सूची में दूसरे स्थान पर संयुक्त किसान मोर्चा है । तीसरे स्थान पर सीपीएम के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास हैं । संघ मुखपत्र ने इन सब पर राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने का आरोप लगाया है ।
इसका एकदम सटीक जवाब किसानों के एतिहासिक संघर्ष से उभरे, फौलादी एकता के प्रतीक संयुक्त किसान मोर्चे ने 10 अगस्त की कार्यवाहियों के जरिये दिया । अपने मेहनतकश जुडवां मजदूरों के संयुक्त समन्वय के साथ मिलकर इस दिन किसानों ने देश भर के एक हजार से अधिक स्थानों पर 10 लाख से ज्यादा की तादाद में जेल भरो आन्दोलन करके जंतर मंतर के उभार के साथ ताल से ताल ही नहीं मिलाई बल्कि उसे उस दिशा की ओर भी आगे बढाया जो लोकतंत्र, समावेशी समाज और उसमे भी बेहतर भारत की ओर ले जाता है । उन वर्गीय सवालों की तरफ बढाया जो आत्मनिर्भरता, संप्रभुता, लोकतंत्र ही नहीं मानवीय भारत के निर्माण की बुनियाद हैं । भारत के स्वतंत्रता संग्राम के युगांतरकारी दिन 9 अगस्त के नारे को और ज्यादा मुखरता के साथ गुंजाते हुए एलान किया कि : अडानी अम्बानी के चाकरो भारत छोड़ो, ट्रम्प से डरने वालो भारत छोड़ो । यह समय, जिसे कुछ सप्ताह पहले तक सबसे मुश्किल और दुष्कर समय माना जाता रहा वह समय सबसे अधिक संभावनावान समय बदल गया है । उधर युवतर भारत – जेन जी – शिक्षा और रोजगार को एजेंडे पर ला रहा है, इधर किसान मजदूर उन बुनियादी सवालों को चर्चा में ला रहे थे जो किसी भी देश की रीढ़ होते हैं ।
जैसा कि अब हर हिन्दुस्तानी जानता है कि मजदूर किसानों से तो मोदी सरकार ने दुश्मनी ही ठानी हुई है । किसानों की आमदनी दो गुना करने का दावा किया और खेती किसानी बर्बाद कर दी । मजदूरों को बेहतरी के सपने दिखाए और चार श्रम संहिताओं की बेड़ियों में जकड़ दिया । खेत मजदूरों सहित ग्रामीण श्रमिकों के पहले से ही बदहाल हाल को और ज्यादा बेहाल कर दिया । हर साल दो करोड़ रोजगार देने का झांसा दिया और पहले से मौजूद करोड़ों रोजगार ख़त्म करते हुए भविष्य में नए रोजगार अवसर पैदा होने की संभावनाए ही समाप्त कर दी । भविष्य के जागरूक नागरिक तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों को दमघोंटू यातनागृहों में तब्दील करने की तो जैसे परियोजना ही शुरू कर दी है । यह सब करते हुए, इन्ही के साथ महिलाओं सहित समाज के वंचित और पहले से ही शोषित हिस्सों दलितों, पिछड़ों को कुख्यात मनु की यंत्रणाओं वाले युग में वापस पहुंचाने की कुटिल साजिशें तेज से तेजतर की जा रही हैं ।
कुल मिलाकर हालात यह हैं कि पूरा कुनबा सरे बाजार निर्वस्त्र खड़ा है, जितना खुद को ढांपने के जतन कर रहा है, उतना ही और उघड़ रहा है । जुलाई से जेन जी और उसके बाद 10 अगस्त और उसके अभियान में उसके तथा जेन अल्फा के अभिभावकों – किसान और मजदूरों – ने एक हजार से अधिक जगहों पर दस लाख से अधिक संख्या में गिरफ्तारियां देकर इसी प्रक्रिया को गति भी दी है, दिशा भी दी है ।
इतिहास में ऐसे समय आते हैं जब देश और जनता को, वर्तमान और भविष्य को बचाने के लिए बोलना जरूरी होता है । मगर ऐसे भी समय आते हैं जब सिर्फ बोलना या असहमति में हाथ उठाना काफी नहीं होता – सडकों पर उतरना भी होता है । भारत के इतिहास में आज का समय ऐसा ही समय है । दिल्ली के जंतर मंतर पर युवक युवतियां जूझ रहे हैं बाकी शहरों में भी युवा पीढ़ी उबाल पर है । किसान मजदूर मुट्ठियाँ ताने सड़कों पर मोर्चा ले रहे हैं । इसे और तेजी, और तीव्रता से आगे बढ़ाना होगा ।
स्वतन्त्रता की जबर लड़ाई और उसके बाद राजनीतिक स्वतंत्रता को आर्थिक और सामाजिक गुलामी का आजादी के लिए हुए अनगिनत संग्रामों से हासिल भारत को बचाना है, इसे भगत सिंह और अम्बेडकर के सपनों के अनुरूप बनाना है तो संघर्षों के उनके दिखाए रास्ते पर चलना होगा । उन्होंने जिस बुलंद आवाज में अंग्रेजो भारत छोडो का नारा दिया था उससे भी ज्यादा तेज आवाज में अडानी,अम्बानी के दलालों, अमरीका से डरने वालो, देश को बांटने वालो भारत छोडो का नारा बुलंद करना होगा ।