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हरियाणा: सामाजिक संकट में बदल रही है अलाभकारी खेती और बेरोजगारी 

हरियाणा: सामाजिक संकट में बदल रही है अलाभकारी खेती और बेरोजगारी 

लागत खर्चों में वृद्धि और उसके अनुपात में आमदनी का नहीं बढ़ना किसानों की बदहाली की एक स्वाभाविक वजह माना जाता है जो वाजिब भी है।  इस घाटे के सौदे के चलते हरियाणा विधानसभा में 19 दिसंबर को दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के 25 लाख से अधिक किसानों पर 60 हजार करोड़ रु से अधिक कर्ज खड़ा है।

इसके अलावा कृषि में मशीनीकरण के बढ़ने से खेत मजदूरों का रोजगार भी घट गया। ऊपर से मनरेगा का काम ठप्प करके उसे”विकसित भारत -गारंटी रोजगार एवं आजीविका मिशन” में बदल दिये जाने से काम की कानूनी गारंटी नहीं रहेगी तथा आर्थिक बदहाली और बढे़ेगी। गरीब किसान समुदायों के अलावा  देहात में दलित व पिछड़े समुदाय शामिल हैं जिन पर महंगाई और आर्थिक तंगी बढे़ेगी । महिलाओं को ये आर्थिक व सामाजिक दबाव सबसे ज्यादा झेलने पड़ रहे हैं जिन्हें माइक्रो फाइनेंस के जाल में फंसाकर शोषण का शिकार बनाया जा रहा है।

कृषि संकट के उपरोक्त आर्थिक लक्षणों के अलावा समाजिक जन जीवन में संकट की अभिव्यक्ति किसान खेत मजदूरों की बढ़ रही आत्महत्याएं एक सामाजिक चिंता का विषय है जिसका कारण आर्थिक है पर खुदकुशी अपने आपमें एक सामाजिक लक्षण है।

ग्रामीण जन जीवन में संकट के गहराने की वास्तविक स्थिति समग्रता में सामने नहीं आ पाती। इसके चलते मुद्दों और मांगों को चिन्हित करके हस्तक्षेप की समग्र कार्यनीति भी नहीं बनती और आंदोलन व संगठन की सीमाएं भी सिकुड़ी हुई रह जाती हैं। इसलिए स्थानीय मुद्दों लेकर को किसान मजदूर एकता पर आधारित समूचे ग्रामीण अंचल का संबोधन बनाने की ओर भी बढ़ना होगा।

उदाहरण के तौर पर बेरोजगारी की समस्या न केवल शिक्षित व कम शिक्षित युवाओं में गहरा रोष पैदा कर रही है बल्कि पूरे समाज के स्तर पर एक विस्फोटक स्थिति की ओर ले जा रही है। हाल में हरियाणा, पंजाब गुजरात और अन्य प्रदेश के सैंकड़ों युवाओं को हथकड़ी- बेड़ी लगाकर अमेरिका के एयर फोर्स विमानों द्वारा ट्रंप प्रशासन ने वापिस भारत में लाकर छोड़ा वह शर्मनाक तो था ही परंतु इन बदनसीब युवाओं के अमेरिका में जाने और वापिस लाए जाने के दौरान क्या-क्या घटित हुआ उस पर गौर करना भी जरूरी है। विदेश मंत्री जयशंकर ने 4 दिसंबर को राज्य सभा में बताया कि इस साल 3258 ,पिछले साल 1368  और 2023 में 617  युवाओं को अमेरिका से वापिस भेजा गया । गत 25 अक्टूबर 2025 को दिल्ली हवाई अड्डे पर 54 युवाओं को उतारा गया इनमें 33 हरियाणा के थे और बाकी पंजाब और गुजरात से थी इनमें सबको हथकड़ी- बेड़ी लगाई गई थी जो 25 घंटे तक लगी रही । कुछ युवाओं ने बताया कि उन्हें मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। ज्यादातर युवाओं ने समाजिक कलंक के डर से अपनी पहचान  मीडिया को बतानी मुनासिब नहीं समझी। वे किसान परिवारों से संबंध रखते हैं और अपने परिवार की जमीनों को बेचकर 45 लाख रुपए से 65 लाख रुपए तक एजेंटों को देकर गए थे । यह सही है कि ये सभी युवा तकनीकी रूप से अवैध प्रवासी थे परंतु इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि ये सभी बेरोज़गारी के शिकार हैं और मेहनत की कमाई करने विदेशों में जाने को व्याकुल थे।

इनमें से एक अंबाला गांव का युवक 2021 में गया था। उसने बताया कि “उनके लाखों रुपए डूब गए। यूरिया, डीजल, पेस्टीसाइड, लेबर, ट्रांसपोर्ट, बीज, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सभी महंगे हो गए । खेती में बचत नहीं है। यदि यहां रोजगार मिल जाए तो परिवार से इतनी दूर क्यों जाएं ? यदि पीछे से परिवार में किसी को कुछ हो जाए तो संभालने भी नहीं आ सकते।”

  35-40 लाख से लेकर 60-65 लाख रु तक एजेंटों द्वारा प्रति व्यक्ति ऐंठा जाता है। पकड़े जाने पर वापिस आए युवाओं ने यहां तक बताया कि घने जंगलों के बीच भूख प्यास से तड़प रहे युवाओं से अपने परिवारों को फोन करवाए जाते हैं कि वे बकाया राशि स्थानीय एजेंट को अदा करेंगे तभी उनको अमेरिका की सीमा में घुसाने का अगला कदम उठाया जाएगा।

इस प्रकार कई युवाओं ने अपने कड़वे अनुभव काल्पनिक नामों से छापने की शर्त पर अखबार वालों को बताए। उन्होंनें बताया कि कैसे उनके सपनों पर पानी फिर गया। बहरहाल जो अविवाहित हैं वह अपनी पहचान जाहिर करने से कतराते भी हैं । जमीन बेचे जाने का प्रचार हो जाएगा तो परिवार की प्रतिष्ठा पर आंच आएगी खुद की और भाई-बहनों की शादी होने में दिक्कत आ सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस बीच यह उपदेश देना जरुरी समझा कि गैरकानूनी तरीके से विदेश न जाएं। उनके अपने कार्यकाल में तमाम एजेंट और एजेंसियां धड़ल्ले से “डोंकी रुट” से विदेश भेजने के गैरकानूनी और आपराधिक धंधे में बाकायदा विज्ञापन जारी करके लगे हुए थे। बेरोजगारों की मजबूरी का दोहन करके उनके परिवारों को लूटने का काम उनकी नाक के नीचे होता रहा और अभी भी जारी है। एजेंटों को फलने फूलने का सुनहरी अवसर देकर अब खट्टर जी उपदेशक बन गए हैं।

हरियाणा में बेरोजगारी के आलम का आश्चर्यचकित करने वाला एक और उदाहरण देखिये । 2023-24 में ग्रुप- डी  यानी माली, चपड़ासी, हेल्पर, बेलदार आदि की 13536 नौकरियां निकली। हरियाणा सर्विस सलेक्शन कमीशन ने इसके लिए परिक्षा घोषित की। इसके लिए 13 लाख 75 हजार उम्मीदवारों ने आवेदन किया और 8 लाख 55 हजार ने टेस्ट दिया। दूसरा उदाहरण भी कम हैरत करने वाला नहीं है। सफाई कर्मचारियों के लिए 2024 में 6112 नौकरियां निकली इसके लिए 39500 आवेदन आए जिनमें से 3990 ग्रेजुएट और पोस्ट -ग्रेजुएट भी थे।

पक्की नौकरियां अब अतीत की कहानी हो चुकी है। हरियाणा में कौशल रोजगार निगम बनाया गया है जो भर्तियां करता है। उनको स्थाई कर्मचारियों की तुलना में आधे से भी कम वेतन मिलता है और काम उनसे भी ज्यादा लिया जाता है। सेना में भर्ती होना देहात के युवाओं के लिए रोजगार का एक विकल्प होता था उसे भी अग्निवीर जैसी योजना ने चौपट कर दिया। जो लाखों युवा इस ख़तरनाक योजना के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे वही आज अग्निवीर के तौर पर भर्ती होने की लाइन में लगने को विवस हो गए हैं।

कृषि भूमि की जोत का आकार लगातार छोटा हो रहा है। उधर कृषि की उपजाऊ भूमि की कुल मात्रा के घटने की गति हैरान कर देने वाली है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने राज्य  सभा में माकपा सांसद ए. ए. रहीम के प्रश्न का उत्तर देते हुए लिखित में बताया कि देश में कुल कृषि भूमि हाल के वर्षों में चिंताजनक रुप से घट कर गैर कृषि के रूप में परिवर्तित की जा रही है। हरियाणा में यह रुझान और भी चिंताजनक है। मात्र 1 साल में यानी 2022-23 के मुकाबले 2023-24 में कुल काश्त योग्य भूमि का रकबा 2 लाख 40 हजार एकड़ कम हो गया। उल्लेखनीय है कि हरियाणा का कुल क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल में मात्र 1.34 प्रतिशत है जबकि काश्त योग्य भूमि की देश में जो कुल गिरावट हुई है उसमें से अकेले हरियाणा का हिस्सा 25% है।

ध्यान रहे कि जो कृषि योग्य भूमि गैर कृषि उपयोग में जा रही है वह शहरीकरण या औद्योगिककरण के नाम पर जा रही है और इससे रोजगार के संभावनाएं नगन्य हैं। वास्तव में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की तीन दिशाओं में हरियाणा लगता है और राजधानी दिल्ली का विस्तार हरियाणा में ही हो रहा है। इसके अलावा नेशनल हाईवे का जाल भी ज्यादातर हरियाणा के बीचों बीच फैल गया है जिसमें काफी जमीन चली गई।

अन्य प्रदेशों के बड़े शहरों के चारों ओर भी यही स्थिति है। पंजाब में सरकार द्वारा “लैंड पूल” योजना के तहत 65000 एकड़ भूमि ली जानी थी जिसे पंजाब के किसान आंदोलन के दबाव में वापिस लेना पड़ा है।

उपरोक्त परिदृश्य में कृषि संकट की बदौलत एक ओर बेरोजगारी का संकट गहरा रहा है दूसरी ओर कृषि भूमि पर कारपोरेट की निगाहें टिकी हैं । परंतु औपचारिक या अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार पैदा नहीं हो रहे। युवाओं में हताशा और निराशा बढ़ रही है। उन्हें अपराध और नशाखोरी में धकेला जा रहा है जोकि पंजाब व हरियाणा में एक बड़ी सामाजिक समस्या के तौर पर बन चुकी है और अनेक तरह के अपराधों के लिए मूल कारण बन गई है। साथ में ही उन्हें जातिवादी व सांप्रदायिक उन्माद के ईंधन के तौर पर तैयार किया जा रहा है। गौरक्षा के नाम पर पशुपालन करने वाले लोगों की हत्याएं और हिंसा में सम्मिलित कितने ही गिरोह ऐसे पनप गए हैं जो पुलिस और राजनीतिक संरक्षण में धंधा चला रहे हैं। सांप्रदायिक घटनाओं में गरीब तबकों के बेरोज़गार युवाओं को योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग किये जाने का तरीका बाबरी मस्जिद विध्वंस समेत कितने ही मामल़ों में देखा गया।

भयंकर बेरोज़गारी के चलते ये चिंताजनक परिदृश्य देशभर में निर्मित हो रहा है और रोजगार का सवाल एक केंद्रीय मुद्दे के तौर पर खड़ा हो गया है। इसलिए किसान आंदोलन को रोजगार का सवाल भी अपने प्राथमिक एजेंडा में लेना होगा और रोजगार के अधिकार पर युवा आंदोलन के साथ निकट अंतर्मुख (इंटरफेस) स्थापित करना होगा। यह एक नीति परिवर्तन के सवाल से जुडा़ मामला है। इसके अलावा खेलों जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से उनकी रचनात्मक ऊर्जा के लिए मंच प्रदान करने का काम भी किसान-मजदूर आंदोलन को अपने हाथ में लेना होगा।

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