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अयोध्या चढ़ावा चोरी : इस बार गजनवी संघ के गणवेश में आया
अयोध्या में खड़े मोदी –आरएसएस राजनीतिक परियोजना के विराट स्तम्भ, जिसे राममंदिर कहा जाता है उसमे हुई चढ़ावे की लूट का परिमाण और आयाम दोनों ही विराट हैं। शुरू में लूटी गयी रकम 200 करोड़ रुपये से ज्यादा बतायी गयी मगर अब तय हो गया है कि असल रकम इससे कई गुना है । इसलिए कि इस चोरी में सिर्फ हर रोज चढऩे वाले चंदे की गुल्लक से गायब किये गए करेंसी नोट ही नहीं हैं, इनमें राम मन्दिर बनाए जाने की मुहिम शुरू किये जाने के वक्त से लेकर मंदिर बन जाने के बाद तक इकट्ठा होती रही सोने, चांदी, हीरे और अष्टधातु की शिलाएं भी हैं, जो अब गायब बतायी जा रही हैं। इनमें से कुछ पर तो हीरे, मोती और माणिक्यों की जड़ाई भी थी। इन शिलाओं की संख्या ही 1250 बताते हैं। ये सोने के सिक्के या अशर्फियां नहीं हैं, सोने की ईंटें और पट्टिकाएं हैं, जाहिर है कि इनकी असली कीमत तो सैकड़ों करोड़ रुपयों से भी अधिक होगी। देश के पूर्व गृहसचिव ने खुद डेढ़ क्विंटल वजन की रामायण चढ़ाई थी जिसमे कोई 5 किलो तो सोना ही लगा था ; वह भी गायब है । राम की मूर्ति को पहनाया गया हार और पादुकाएं भी चुराई जा चुकी हैं । मोदी द्वारा गठित राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और सारे निर्माणों के इंचार्ज, प्रधानमन्त्री के पूर्व प्रमुख प्रमुख सचिव नृपेन्द्र मिश्रा इसे चोरी नहीं डकैती मानते हैं ।
इस डकैती का आर्थिक जोड़ कितना है इस बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, आने वाले दिनों में और भी सामने आयेगा । मामला इतना बड़ा है कि दरबारी और गोदी मीडिया तक को इस बारे में लिखना और दिखाना पड़ रहा है – इसलिए यहाँ उस बारे में और विस्तार से जाने की जरूरत नहीं है । बस इतना बताना काफी है होगा कि यह लूट किसी भी हिसाब से ठीक एक हजार साल पहले हुयी लूट से कम नहीं है । सन 1026 में गजनी का महमूद सोमनाथ के मंदिर को लूटकर जितना सोना, चांदी, धन, संपदा ले गया था 2026 में उजागर हुई अयोध्या के राम मन्दिर की लूट उससे कम नहीं है, कई माम्मलों में उससे ज्यादा ही है । इन दोनों वारदातों में समानता के साथ दो महत्वपूर्ण और बुनियादी फर्क हैं : सोमनाथ को हमलावर ने लूटा था यहाँ चौकीदार ही चोर है । दूसरा फर्क ज्यादा गंभीर है और वह यह कि उसने मंदिर लूटा था, धर्म नहीं । वह ऐसा चाहता तब भी नहीं करता क्योंकि खुद उसके सेनापतियों का एक हिस्सा हिन्दू था और अपने हिन्दू धर्म का पालन करता था । महमूद गज़नवी की सेना में ‘सिपाही-ए-हिंदुवान’ नामक एक अलग टुकड़ी थी। उसकी सेना के प्रमुख हिंदू सेनापतिओं में सौंधराई हिंदू, तिलक, सौंधी और हरजान राय, बिजराज राय और नाथ जैसे आधा दर्जन से अधिक नाम शामिल थे।
अयोध्या में लुटेरा आरएसएस के गणवेश में आया है । यह तथ्य समझना भी होगा, बताना और समझाना भी होगा । ऐसा क्यों है इसे समझने के लिए शुरू से शुरू करना होगा । पहली बात यह कि यह तुलसी या वाल्मीकि के राम का मंदिर नहीं है । दशरथ के बेटे और सीता के पति राम का मंदिर नहीं है । यह हिन्दू धर्म के ईश्वरों में से एक राम का मन्दिर नहीं है : यह मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी के राम का मंदिर है । आरएसएस और भाजपा के राम का मंदिर है । जिन राम लला को पधराने के लिए देश भर में उन्माद भड़काया गया, साम्प्रदायिक दंगे कराये गए, देश को आजादी के बाद की सबसे जघन्य हिंसा भुगतवाई गयी वह 1949 में स्वतः प्रकट हुई बताई जाने वाली बाल राम – रामलला – की मूर्ति आज भी तहखाने के किसी कोने धरी हुई है । जिन्हें स्थापित और प्राणप्रतिष्ठित किया गया है वे भारत की जनता – सभी धर्मों वाले भारतीयों के राम नहीं है : यह पोलिटिकल राम है । यह पूरा आन्दोलन ही राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का आन्दोलन था, इस मंदिर की स्थापना भी शुद्ध राजनीतिक परियोजना है ।
जो धर्म में विश्वास करते हैं या नहीं भी करते हैं वे अच्छी तरह से जानते हैं यहूदी, बौद्ध, जैन, पारसी, वैदिक , ईसाई, इस्लाम, शैव, वैष्णव, शाक्त, ब्राह्मण, श्रमण धर्म हर धार्मिक स्थान की स्थापना के निर्धारित नियम कायदे होते हैं । उनके अपने धर्मसम्मत तरीके हैं, विधि विधान हैं, पद्वत्तियाँ हैं । जिसे ये कुनबा कभी सनातन तो कभी हिन्दू कहता है उसके हर संस्करण में पूजास्थलों की स्थापना के शास्त्रसम्मत तौरतरीके हैं । बिना उनके धर्म स्थान नहीं बनते । रामायण के अनुसार, जब राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की, तो वह तभी प्राणप्रतिष्ठित – पूजा के योग्य – मानी गयी जब शास्त्रसम्मत रीति से विद्वान् आचार्य ने आकर विधिमान्य प्रक्रिया पूरी की । और यह आचार्य और कोई नहीं जिसके खिलाफ युद्ध लड़ा जाना था वह रावण ही था – क्योंकि निर्धारित विधि के अनुसार निकट के बड़े आचार्य की अनदेखी कर किसी और से कर्मकांड नहीं कराया जा सकता था । रावण आया भी और राम तक को अपने द्वारा स्थापित रामेश्वरम को उससे पवित्र करवाना भी पड़ा ।
यहाँ क्या हुआ ? पहले की कारगुजारियां छोड़ भी दें तो सुप्रीम कोर्ट के अजीब फैसले के बाद ट्रस्ट बनाने वाले मोदी, शिलान्यास करने वाले मोदी , उदघाटन करने वाले मोदी , प्राणप्रतिष्ठा करने वाले मोदी, ध्वजारोहण करने वाले मोदी और बाल राम की अंगुली पकड़ उन्हें घर पहुंचाने वाले होर्डिंग पर लटके मोदी यहाँ तक कि धर्मशास्त्रों के मुताबिक़ जिस समय को निषिद्ध बताया जाता है चुनाव के हिसाब से उसका मुहूर्त निकालने वाले मोदी !! अब्राहम लिंकन के जुमले में कहें तो यह बाय द मोदी. ऑफ़ द मोदी, फॉर द मोदी है, इसमें भागवत और जोड़ लीजिये तो पिक्चर पूरी हो जाती है । अब जब सब कुछ मोदी और संघ है तो चोरी करने वाले मंगल गृह से तो नहीं ही आयेंगे !! अब तो दस्तावेजी सबूत आ चुके हैं कि सिर्फ ट्रस्ट में ही नहीं मंदिर के रखरखाव से लेकर चौकीदार तक मंदिर में बिना किसी अपवाद सब के सब संघी हैं । चम्पत राय खुद संघ की ओर से नियुक्त किये गए हैं । नृपेन्द्र मिश्रा से लेकर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविन्द गिरी महाराज तक हरेक ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि हर मामले में जिनका एकछत्र वर्चस्व था वे मोदी नियुक्त ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय थे । जो खुद पक्के संघी ही नहीं है पिछली आधी शताब्दी से आरएसएस के प्रचारक हैं । खुद उन्होंने बताया है कि संघ ने मस्जिद ढहाने से पहले 1991 से उन्हें अयोध्या भेजा हुआ है । उनके किये धरे से संघ अब पल्ला कैसे झाड़ सकता है ।
चम्पत एक व्यक्ति नहीं है ; वे एक बटन है, एक प्रोग्राम है, एक पासवर्ड है । चम्पत एक विचार हैं : वह विचार जिसने राममंदिर को अपना एटीएम और कारूं का खजाना बनाया हुआ है । चम्पत राय चालीस चोरों के खजाने के खुलने का कोड “खुल जा सिम सिम” हैं । इसलिए यह पैसा चोरी नहीं हुआ है,, यह डकैती हजारों करोड़ रुपयों की साईंफनिंग है और वह साईंफनिंग किसके लिए हुई है इसे बूझने के लिए शर्लाक होम्स या अगाथा क्रिस्टी होने की दरकार नहीं है ? अगर सब कुछ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के नियंत्रण में है तो जाहिर है इस लूट के सीधे बेनिफिशियरी यही दोनो हैं । एक खुली और निष्पक्ष जांच इसका पर्दाफ़ाश कर सकती है । यह बात घोटालेबाज भी जानते हैं । इसीलिए बिना एफआईआर दर्ज किये विशेष जांच दल बना दिया गया और यह एसआईटी कैसे काम कर रही इसकी सूचना खुद चम्पत राय ने दे दी जब उन्होंने बताया कि हालांकि वह परम गोपनीय थी फिर भी एस आई टी की प्राथमिक रिपोर्ट उनके और ट्रस्ट के सामने प्रस्तुत की गयी । अब जब अपराधी ही तफ्तीश करेगा तो नतीजा क्या निकलेगा इसे समझा जा सकता है ।
चढ़ावा चोरी और उसके बाद पूरी बेशर्मी से उसे जायज बताने का काम इसी तरह की हरकत का एक लक्षण है । “राम लला हम आयेंगे – मंदिर वहीँ बनायेंगे”तो झांसा था असली नारा तो “रामलला हम आयेंगे – अपनी सरकार बनायेंगे और चढ़ावा चट कर जायेंगे ।“ “रामलला हम आयेंगे – चन्दा हमी चुरायेंगे” था ।
यह सब अनायास नहीं है – यह एक साजिश का हिस्सा है । चढ़ावे की लूट उस नासूर का एक और रिसाव है । यह धर्म का दुरूपयोग करके राजनीतिक सत्ता पर कब्जे, सामाजिक प्रभुत्व की कायमी और आस्थावान धर्माबलम्बियों की मति हर लेने के बाद उनकी श्रद्धा का मखौल उड़ाना है : उनकी धर्म के प्रति लगाव के प्रतीक चढ़ावे का दुरुपयोग करना है । आरएसएस के कुल इतिहास को देखते हुए यह कोई अचम्भे की बात भी नहीं है । ऊपर दिए ब्यौरे से साफ़ हो जाता है कि संघ हो या भाजपा दोनों ही का धर्म, हिन्दू या सनातन किसी भी तरह के धर्म से कोई ताल्लुक नहीं हैं । धर्म का सिर्फ वे लोगों की भावनाओं का दोहन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और इस तरह वे सबसे पहले उसी धर्म को नुक्सान पहुंचाते हैं । स्वामी विवेकानंद यह बात साफ़ साफ़ कह चुके थे कि धर्म के एजेंट सबसे पहले अपने ही धर्म को अधर्म बनाते हैं । राम को लोकप्रिय बनाने वाले तुलसी भी इन वंचक भगतों के बारे लिखकर बता गए हैं । इतिहास बताता है कि जब जब धर्म काराजनीतिक इस्तेमाल हुआ है – सबसे पहले सबसे ज्यादा वही धर्म खतरे में पड़ा है जिसके नाम पर यह धतकरम किया गया ।
ओसामा बिन लादेन के पोलिटिकल इस्लाम ने इस्लाम को, बेंजामिन नेतान्याहू के यहूदीवाद ने यहूदी धर्म को नुक्सान पहुंचाया । एक जमाने के पोपों और राजाओं के गठबंधन ने इसाईयत को हानि पहुंचाई । म्यांमार में असिन विराथू का नाम का बौद्ध भिक्खु है जिसने बुद्ध के प्रगतिशील, समावेशी और मानवीय संवेदनाओं वाले धम्म की वाट लगा रखी है और रोहिन्गियाइयों का कत्लेआम करवा रहा है । हिन्दुओं की नागरिकता छीन लेने की मुहिम चलाये हुए हैं ।
इनके पाखंड को उजागर करना होगा ।