Magazine
भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ खिलवाड़ की साजिश
भारत का खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, जो दुनिया के सबसे बड़े खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों में से एक है, ऐसे महत्वपूर्ण बदलावों के दौर से गुजर रहा है जो इसके भविष्य को खतरे में डाल सकते हैं। भारत की कल्याणकारी व्यवस्था पर लगातार हमले हो रहे हैं। पहले इसका उदाहरण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मामले में देखने को मिला और अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एन एफ एस ए ) को निशाना बनाया जा रहा है। लगभग 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने वाला एन एफ एस ए उन कानूनों में से एक है जिन्हें जनता के निरंतर चले अभियानों और संघर्षों के परिणामस्वरूप हासिल किया गया। इसने खाद्य के अधिकार को संवैधानिक दायित्व के रूप में मान्यता दी।
एन एफ एस ए और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी सी एस) को कमजोर करने के लिए संशोधन का रास्ता अपनाया जाना सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाले सार्वजनिक खर्च को कम करने के व्यापक एजेंडे का हिस्सा है। रिपोर्टों से यह भी संकेत मिलता है कि नियमों में बदलाव के माध्यम से निजीकरण को बढ़ावा देने और भारतीय खाद्य निगम (एफ सी आई) के भंडारण साइलो पर कुछ बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों का एकाधिकार स्थापित करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में डिजिटल मुद्रा को बढ़ावा देना भी दक्षता और चोरी रोकने के नाम पर अधिक लोगो को इस से बाहर करने के प्रयसों की ओर संकेत करता है। तीन कृषि कानूनों की हार के बाद, ये ऐसे नए प्रयास हैं जिनके माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कमजोर करने और भारत की कृषि तथा खाद्य व्यवस्था में कॉरपोरेट कंपनियों की भूमिका बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
एन एफ एस ए में संशोधन
सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026 के मसौदे पर टिप्पणियां आमंत्रित की हैं। सरकार द्वारा प्रस्तावित प्रमुख संशोधन का उद्देश्य अंत्योदय अन्न योजना के परिवारों को मिलने वाले खाद्यान्न के वर्तमान 35 किलोग्राम प्रति माह के आवंटन को बदलकर प्रति व्यक्ति 7 किलोग्राम, अधिकतम 35 किलोग्राम प्रति परिवार करना है। अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आने वाले परिवार समाज के सबसे गरीब तबके में शामिल हैं। इस बदलाव को उचित ठहराते हुए सरकार का तर्क है कि इससे ‘श्रेणी के भीतर असमानताओं’ को दूर करने, खाद्यान्न आवंटन को अधिक तर्कसंगत बनाने और अधिकारों को पोषण संबंधी आवश्यकताओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ने में मदद मिलेगी। सरकार का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में छोटे परिवारों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलता है।
हालांकि, सरकार के इस तर्क का विरोध किया गया है और इससे मुख्य रूप से उन दक्षिणी राज्यों के प्रति पक्षपात सामने आता है, जिन्होंने परिवार नियोजन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। संशोधित व्यवस्था के तहत इन राज्यों को केंद्रीय खाद्यान्न भंडार से मिलने वाले आवंटन में भारी कमी का सामना करना पड़ेगा।द बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा तैयार किए गए एक अनुमान के अनुसार, बिहार जैसे अपेक्षाकृत बड़े औसत परिवार वाले उत्तरी राज्यों, जहां औसत परिवार का आकार 5 सदस्य है, और पंजाब, जहां यह 4.64 है, को बहुत कम या कोई नुकसान नहीं होगा। इसके विपरीत, छोटे परिवार वाले दक्षिणी राज्यों में कटौती काफी अधिक होगी। केरल में एक औसत अंत्योदय अन्न योजना परिवार को प्रति माह 13.5 किलोग्राम, तेलंगाना में 15.61 किलोग्राम और आंध्र प्रदेश में 15.89 किलोग्राम खाद्यान्न कम मिलेगा। पूरे देश में औसत परिवार का आकार 3.59 सदस्य है। इसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रति परिवार लगभग 9.87 किलोग्राम की मासिक कमी होगी और 35 किलोग्राम का वर्तमान अधिकार घटकर लगभग 25.13 किलोग्राम रह जाएगा।
इसके अलावा, नए संशोधन में बड़े परिवारों के लिए भी कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं किया गया है, क्योंकि खाद्यान्न की अधिकतम सीमा 35 किलोग्राम ही रखी गई है। इस प्रकार प्रति व्यक्ति के आधार पर समानता का सिद्धांत हर स्तर पर विफल हो जाता है।
नया संशोधन अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आने वाले परिवारों की संख्या बढ़ाने और उनकी पहचान को समय-समय पर संशोधित करने की लंबे समय से चली आ रही आवश्यकता के बिल्कुल उलट है। वर्तमान में भी लाभार्थी परिवारों की संख्या 2011 की जनगणना के आधार पर तय होने के कारण वास्तविक जरूरत के मुकाबले कम है। इसलिए नए संशोधन के परिणामस्वरूप एन एफ एस ए का वास्तविक लाभार्थी क्षेत्र और भी सिकुड़ जाएगा, जबकि आवश्यकता इसके विस्तार की थी।
एन एफ एस ए के अंतर्गत खाद्यान्न आवंटन में इन नए बदलावों को “मानव जीवन चक्र दृष्टिकोण” के माध्यम से खाद्य और पोषण सुरक्षा मजबूत करने के नाम पर उचित ठहराया जा रहा है। लेकिन वास्तविक पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह लंबे समय से स्वीकार किया गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खाद्य टोकरी में दालों, तिलहनों और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों को अधिक व्यापक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसके बजाय खाद्यान्न के आवंटन में कमी से लोगों की कुल कैलोरी आवश्यकताओं पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
भारतीय खाद्य निगम के साइलो पर कॉरपोरेट एकाधिकार
एन एफ एस ए मे यह संशोधन ऐसे समय किए जा रहे हैं जब भारतीय खाद्य निगम पर बड़े कॉरपोरेट हितों के बढ़ते एकाधिकार के संकेत मिल रहे हैं। यह बहुत पुरानी बात नहीं है कि तीन कृषि कानूनों का किसानों ने जोरदार विरोध किया था, क्योंकि उनके माध्यम से भारतीय कृषि पर कॉरपोरेट कब्जे का रास्ता खोलने की कोशिश की गई थी। ऐतिहासिक किसान आंदोलन के कारण इन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा। लेकिन अब उसी प्रकार का एकाधिकारवादी कॉरपोरेट नियंत्रण दूसरे और से छिपे हुए रास्तों से लाने की कोशिश की जा रही है।
खोजी मीडिया पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्टों के अनुसार, निविदा नियमों में प्रशासनिक बदलावों के माध्यम से सरकार द्वारा भारतीय खाद्य निगम के साइलो बनाने के लिए शुरू की गई ‘हब एंड स्पोक’ योजना में एक प्रकार के ‘द्विध्रुवीय एकाधिकार’ को बढ़ावा दिया। अडानी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने मिलकर 134 साइलो अनुबंधों में से 110 हासिल किए, जिनकी कुल कीमत 16,500 करोड़ रुपये से अधिक है।
दूसरे शब्दों में, कुल 60 लाख मीट्रिक टन अनाज में से लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन अनाज इन दोनों कंपनियों के स्वामित्व वाले साइलो में रखा जाएगा। इसके अलावा, इन साइलो को मंडी का दर्जा भी प्रदान किया गया है।
समाचार पोर्टल द्वारा जांचे गए दस्तावेजों, जिनमें नीति आयोग, भारतीय खाद्य निगम और अन्य सरकारी संस्थाओं के बीच हुई बैठकों के आधिकारिक विवरण भी शामिल हैं, से पता चलता है कि भारतीय खाद्य निगम द्वारा प्रस्तावित ‘एकाधिकार-विरोधी’ प्रावधानों को जानबूझकर कमजोर किया गया। इसके बाद औपचारिक प्रक्रियाओं के माध्यम से एक कॉरपोरेट एकाधिकार स्थापित होने का रास्ता तैयार हुआ।
यह भारत के सार्वजनिक संसाधनों और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते कॉरपोरेट एकाधिकार की व्यापक प्रवृत्ति से अलग नहीं है।
डिजिटल उपकरण और बहिष्करण
इन घटनाक्रमों के अलावा, लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली वितरण के लिए डिजिटल उपकरणों को शामिल करने वाले और भी सुधार प्रस्तावित किए जा रहे हैं। इस वर्ष की शुरुआत में गुजरात में देश का पहला केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा.आधारित डिजिटल खाद्य मुद्रा पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। इस व्यवस्था के तहत भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तैयार किए गए डिजिटल कूपन लाभार्थियों के खातों में प्रोग्रामेबल डिजिटल मुद्रा के रूप में सीधे पहुंचाए जाएंगे।
इस डिजिटल मुद्रा का इस्तेमाल केवल निर्धारित खाद्य वस्तुओं की खरीद के लिए किया जा सकेगा। दावा किया गया है कि यह डिजिटल व्यवस्था आधार आधारित बायोमेट्रिक प्रणाली में आने वाली त्रुटियों को दूर करेगी। पहले इसे केंद्रशासित प्रदेशों में लागू करने और बाद में पूरे देश में विस्तार करने की संभावना है।
इस प्रक्रिया में लाभार्थी की पहचान, वाउचर तैयार करना, बायोमेट्रिक/ओ टी पी प्रमाणीकरण, एस एम एस अथवा क्यू आर कोड के माध्यम से ई- रूपी I वाउचर जारी करना आदि की एक लंबी प्रक्रिया शामिल होगी। यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे लाभार्थी सीधे राशन प्राप्त करने की प्रक्रिया से जुड़ जाएगा और राशन डीलरों तथा अन्य मध्यस्थों की भूमिका समाप्त हो जाएगी। यह सरकार द्वारा बढ़ावा दिए जा रहे डिजिटल वित्तीय शासन का ही एक हिस्सा है।
हालांकि, जैसा कि आधार से जुड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली व्यवस्था के मामले में देखा गया है, यह व्यवस्था भी बड़े पैमाने पर लोगों के बाहर करने की संभावना पैदा कर सकती है। इस योजना की बुनियादी धारणा यह है कि सभी लाभार्थी परिवारों के पास मोबाइल फोन और डिजिटल मुद्रा के कूपन का इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त डिजिटल साक्षरता होगी। यह धारणा जमीनी वास्तविकता से बहुत दूर है।
राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि ग्रामीण भारत में स्मार्टफोन, इंटरनेट और बुनियादी डिजिटल साक्षरता तक पहुंच अभी भी बेहद असमान है। हाशिए पर रहने वाले समुदायों में यह असमानता और अधिक गहरी है—जबकि यही समुदाय एन एफ एस ए के प्राथमिक लाभार्थी हैं।
अंततः, इन सुधारों का वास्तविक उद्देश्य खाद्य सब्सिडी में कटौती करना, न्यूनतम समर्थन मूल्य को सीमित करना और सरकारी खुले खाद्यान्न खरीद को कम करना है। केंद्र सरकार के सब्सिडी बिल को कम करने के लिए दक्षता और समानता की परिचित भाषा का इस्तेमाल इन कटौतियों को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है।
भारत की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था, जो करोड़ों लोगों के लिए जीवनरेखा है, किसी भी तरह से कमजोर करने के प्रयासों के खिलाफ अधिक सतर्कता और प्रतिरोध की आवश्यकता है। इसलिए एन एफ एस ए में किए जा रहे इन प्रतिगामी संशोधनों का विरोध करना और उन्हें पराजित करना आवश्यक है।