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अखिल भारतीय किसान सभा के 90 वर्ष: नाम, झण्डे और रास्ते के लिए संघर्ष का इतिहास: तीन

अखिल भारतीय किसान सभा के 90 वर्ष: नाम, झण्डे और रास्ते के लिए संघर्ष का इतिहास: तीन

नाम और झण्डे  सिर्फ नाम और झण्डे भर का सवाल नहीं था।  यह किसानों की अपनी राजनीति और कार्यनीति दोनों से जुड़ा सवाल था। सार रूप में यह वैचारिक मोर्चे पर  वर्गसंघर्ष की अभिव्यक्ति था। शुरुआत अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के नाम से हुयी। मगर कांग्रेस नेताओं के रुख को देखने के बाद संगठन की स्वतंत्र छवि बनाने की जरूरत प्रमुख हो गयी और जुलाई 1937  न्यामतपुर गया में हुयी किसान कौंसिल की बैठक में नाम – अखिल भारतीय किसान सभा करने का निर्णय हो गया।  लाल झण्डे का उपयोग किसान सभा पहले से ही कर रही थी मगर अक्टूबर 1937 में कलकत्ता में हुयी सीकेसी में हँसिये हथौड़े के साथ लालझण्डा संगठन का झण्डा बन गया।  यह रास्ते की शिनाख्त का पहला चरण था। कोमिल्ला में 1938 में हुयी तीसरी कांफ्रेंस ने लाल झंडे के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को भी फहराने का निर्णय लिया।   

अगला दौर आजादी के बाद आया जब दहाणु में हुए 13 वे सम्मेलन से विचार की दूसरी लड़ाई शुरू हुयी।  वर्ग संघर्ष पर उभरे, सुधारवादी-समझौतावादी धाराएं उभर कर आईं और उपज के दामों में तीखी गिरावट, महंगाई, बंटाईदारों की बेदखली बढ़ने के बाद भी एक हिस्से ने लड़ाईयां छेड़ने में आनाकानी की।  अगली साल अमृतसर में हुए सम्मेलन में झण्डे का सवाल भी उठा – इसे विभाजन को देखते हुए टाल दिया गया।  बोंगांव बर्धमान में हुयी 15वीं कांफ्रेस में दो धाराएं आमने सामने आ गयीं।  एक वे थे जो बिना किसी वर्गीय टकराव के संवैधानिक दायरे में आन्दोलनों के हामी थे, खेतमजदूरों और गरीब किसानों तथा भूमिहीनों के संघर्षों से अरुचि रखते थे।  इस सम्मेलन में झण्डे के सवाल पर मतदान तक हुआ।  लाल झण्डे पर हल के निशाँ वाले प्रस्ताव पर 8, लाल झण्डे पर हँसिये हथौड़े के प्रस्ताव पर 40 और लाल झण्डे पर सिर्फ हंसिया होने के प्रस्ताव पर 97 वोट पड़े।  यही झंडा करीब एक दशक – 1969 – तक चला।  इस साल बर्धमान के बारसूल में हुए 20वे सम्मेलन में  फिर से हँसिये हथोड़े वाले लाल झण्डे को  झण्डा बनाया गया। 

इसी बीसवे सम्मेलन में एक संकीर्णतावादी रुझान भी सामने आया जो किसी भी तरह की मांगो पर जनांदोलन की बजाय सीधे हथियार उठाने की बचकानी रखता था। 

इस प्रकार सवाल सिर्फ झण्डे का नहीं था।  यह विद्यमान ठोस आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक हालत का  ठोस विश्लेषण कर समुचित कार्यनीति  से जुड़ा था। यह वैचारिक संघर्ष 1955 से 1967 तक चला।  एक बार (18 वे सम्मेलन त्रिचूर ; 30 मार्च-२ अप्रैल 1961)  महासचिव के लिए चुनाव भी हुआ।  अंततः 1967 में ज़ेड ए अहमद के गुट ने अपनी किसान सभा अलग से बना ली।  

किसान सभा अपने पहले सम्मेलन से ही “किसानो मजदूरों को पूर्ण आर्थिक राजनीतिक शक्ति दिलाने” का लक्ष्य लिए हुए है।  सहजानंद सरस्वती से आचार्य नरेंद्र देव, राहुल सांकृत्यायन, मुज़फ्फर अहमद होते हुए ए के गोपालन तक सभी अध्यक्षों ने किसान मजदूरों की मुक्ति के लिए किसानो-खेतमजदूरों-गरीब किसानो और मजदूरों को मुक्तिकामी संघर्ष की धुरी बताया है लिहाजा हंसिया हथोड़ा होना सिर्फ प्रतीकात्मकता की बात नहीं थी इसका रीति नीति, रणनीति और कार्यनीति दोनों से सीधा ताल्लुक था।  इसीलिये किसान सभा ने फैज़पुर में हुए दूसरे सम्मेलन से ही मई दिवस मनाने का भी आव्हान किया था।  किसानसभा के अनेक सम्मेलनों ने किसान मजदूर मैत्री को ठोस आकार देने के प्रस्ताव पारित किये, कार्यक्रम भी बनाये।  यह आज भी जारी काम है।  

राजनीतिक पार्टियों के साथ किसान सभा के रिश्ते पर भी कई बहसें हुईं।  इसे बहुत सुव्यवस्थित और तार्किक तरीके से नौंवे सम्मेलन में ही अध्यक्ष काका बाबू मुज़फ्फर अहमद ने निष्कर्ष तक पहुंचा दिया।  उन्होंने किसान सभा को आम किसानो का वास्तविक संगठन बनाने, सदस्य्ता लेने तथा नेतृत्व में आने के लिए किसी भी तरह की राजनीतिक शर्त न रखने की बात  जोर देकर कही।  अपने तीसरे सम्मेलन (1938) में ही  किसान सभा तय कर चुकी थी कि कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति 6 आना सदस्यता शुल्क देकर सदस्य बन सकता है।  ध्यान रहे कि यह वह समय था जब कांग्रेस की सदस्य्ता शुल्क चार आना थी।  गौरतलब है कि 1956 के अमृतसर में हुए 14 वे सम्मेलन में एक सुझाव यह भी आया था कि किसान सभा को चुनाव लड़ना चाहिए, बहुमत ने इसे अस्वीकार कर दिया था। 

जाहिर सी बात है कि वैचारिक एकता को मजबूत करने  के लिए एक आमनीति तय करने से बेहतर कोई रास्ता नहीं है। यूं तो स्थापना सम्मेलन में अध्यक्ष सहजानन्द सरस्वती भाषण और स्वीकृत 38 सूत्री मांगपत्र एक आम नीति था – मगर उस दौर में 1939 में गया में समाजवादी नेता आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में हुआ चौथा सम्मेलन राजनीतिक स्पष्टता का सम्मेलन था। यह समाजवादी विचार पर आधारित था।  इस सम्मेलन में खेत मजदूरों के  न्यूनतम वेतन पर भी फैसले लिए।    

बहरहाल कन्नानूर में 2-4 अप्रैल 1953  को हुए 11 वे राष्ट्रीय अधिवेशन ने तब तक हुए संघर्षों  के अनुभवों की पृष्ठभूमि, पंचवर्षीय योजना के विश्लेषण और कांग्रेस के साथ रिश्तों आदि पर चर्चा के बाद एक नीति-वक्तव्य मंजूर किया।  इसमें तीन तरफा संघर्ष की राय सूत्रबध्द की गयी ; 

(1) किसानो की बुनियादी मांगों पर संघर्ष ; बिना मुआवजे के जमींदारी का अंत, जमीन का वितरण, निजी साहूकारी कर्जों सहित सरे कर्जों से मुक्ति, सिंचाई-बीज-खाद का बंदोबस्त, उपज के उचित दाम और उसकी पूरी खरीद की गारंटी, किसानो के टैक्स में कमी तथा अमीरों पर ग्रेडेड टैक्स, गरीबों खेतमजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन, काम, आवास के अलावा सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की समाप्ति, महिला समानता।  

(2)  ताजी ताजी हासिल राष्ट्रीय स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता की हिफाजत के लिए संघर्ष ; ब्रिटिश कामनवैल्थ राष्ट्रमण्डल से  किये जाएँ।  फ्रांस के कब्जे वाले पॉन्डिचेरी तथा पुर्तगाली कब्जे वाले गोवा को मुक्त कराने की लड़ाई हो (किसान सभा इसमें शामिल भी थी ), ब्रिटिश पूंजी जब्त की जाए, राष्ट्रीय उद्योगों को संरक्षण दिया जाए, राष्ट्रीय एकता की मजबूती के लिए भाषायी राज्य, विभिन्न भाषाओं तथा संस्कृति  विकास हो,  आदिवासी क्षेत्रो का आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास करते हुए उन्हें क्षेत्रीय स्वायत्तता दी जाए। सारे दमनकारी क़ानून खत्म किये जायें।  

(3) युद्द का विरोध विश्व शान्ति की हिफाजत, सुचिंतित विदेश नीति, एशिया और अफ्रीका से विदेशी सेनाओं की वापसी ; सभी देशो के साथ बराबरी के सांस्कृतिक संबंध।  समाजवादी देशों के साथ घनिष्ठ रिश्ते। पाकिस्तान के साथ व्यापारिक सांस्कृतिक संबंधो का विस्तार। 

इसके बाद वाराणसी में हुए 23 वे सम्मेलन (30 मार्च- 1 अप्रैल 1979) ने पिछले तीन चार दशकों में कृषि क्षेत्र में आये बदलावों के अध्ययन के आधार पर नारों के फिर से तय करने पर विचार किया गया।  विस्तृत अध्ययन के आधार पर इस सम्मेलन ने दर्ज किया कि ग्रामीण वर्गीय संतुलन में बदलाव हुआ है ; अब्सेंटी जमींदार पूंजीवादी जमींदार बन रहे हैं, बड़े फ़ार्म अस्तित्व में आये हैं जिनमे सामंती और पूंजीवादी दोनों के मेल हैं।  इसी के साथ धनी किसान बनने के प्रक्रिया भी तेज हुयी है।  ये सत्ता पार्टी का मुख्य आधार है और सरकार ने इनके लिए खजाने खोल रखे हैं।  इसके चलते बंटाईदारों की बेदखली बढ़ी होइ।  कृषि में पूंजीवाद की घुसपैठ हुयी है।  अब गरीब किसान भी अपना उत्पाद बाजार में बेचने के लिए ले जाने लगे हैं। लिहाजा जोतने वालो को जमीन फौरी लामबंदी का नारा नहीं हो सकता।  यह नारा हासिल किये जाने के लक्ष्य में रहेगा किन्तु इस समय माध्यम, लघु, गरीब, भूमिहीन, बंटाईदार, खेतमजदूरों तथा दस्तकारों की व्यापक एकता बनाने के लिए उपयुक्त नारे तय किये जाने चाहिए।  इस ामझदारी के आधार पर संघर्ष तेजी से बढे और 26 मार्च 1981 को दिल्ली की विशाल किसान रैली तथा 19 जनवरी 1982 के पहले भारत बंद से होते हुए आगे बढे।  

27 वे सम्मेलन हिसार (27-30 सितम्बर 1992) तक आते आते नवउदारीकरण की अमावस शुरू हो चुकी थी, सोवियत संघ में समाजवाद का सूर्य ढल चुका था, ढांचागत सुधार गति पकड़ रहे थे।  इसलिए 1993 में किसान सभा और अखिलभारतीय खेत मजदूर यूनियन के एक साझे सेमीनार ने वैकल्पिक कृषि नीति तैयार की तथा उन मांगों को तय किया जिनके आधार पर नवउदार आर्थिक नीतियों से उपजी आशंकाओं,  साम्प्रदायिकता के उभार के विरुध्द संघर्षो को तीखा करते हुए उनका विस्तार किया जाना था।  अगले सम्मेलन (कटक 19-20 नवंबर 1995) ने चार आयोगों में इन बदलावों तथा उनसे मुकाबला करने लायक बनाने के बारे में चर्चा की।  ये आयोग थे ; भूमि सुधार और भूमि संबंधी मुद्दे, कृषि विकास, पंचायतों  तथा सहकारी समितियों की भूमिका और  जनवादी कार्यप्रणाली पर सर्वसम्मत राय बनाई। बाद में नवउदार के पूरी तरह खुलकर आने के नतीजे दिखने लगे. . जलंधर (2003) से लेकर हिसार 2017 तक खेती और किसानी का संकट सभ्यता के संकट में बदल गया।  इनके विश्लेषण, मूल्यांकन और मुकाबला करने के लिए इस बीच हुए सम्मेलनों ने तो अलग अलग पहलुओं पर आयोग बनाकर चर्चा की ही, बदलती हुयी परिस्थितियों के अनुरूप 28-29 दिसंबर 2001 तथा 31 जनवरी 2009 के खेत मजदूर यूनियन के साथ साझे कन्वेंशंस में दूसरी तथा तीसरी वैकल्पिक कृषि नीति के दस्तावेजों को भी इस बीच हुए बदलावों की रोशनी में अद्यतन किया गया।    

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