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कोरबा: कलेक्ट्रेट घेराव में अमराराम बोले- “भू-विस्थापितों की आवाज संसद में उठाई जाएगी”
छत्तीसगढ़ के आदिवासीबहुल कोरबा जिले की पहचान कोयला खनिज से होती है। इसी खनिज के कारण यह राज्य के समृद्ध जिले में गिना जाता है, लेकिन मानव विकास मानकों में बेहद पिछड़ा भी है। एसईसीएल के अंतर्गत देश की सबसे बड़ी कोयला उत्खनन परियोजना, गेवरा, भी यही है।
इस क्षेत्र में कोयला उत्खनन के लिए भूमि अधिग्रहण का काम
पिछली सदी के 8वें-9वें दशक से शुरू हुआ था और नए और दुर्लभ खनिजों के पाए जाने के साथ 21वीं सदी में आज भी यह जारी है। कोल इंडिया भारत सरकार के नवरत्नों में शामिल है। 40-50 साल पहले सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी ने भूमि अधिग्रहण की जो प्रक्रिया शुरू की थी, उस समय देश के विकास के प्रति आम जनता की ललक के चलते यह प्रक्रिया बिना किसी प्रतिरोध के सहज रूप से संपन्न हुई थी। तब पुनर्वास के नियम कुछ और थे, आज कुछ और है। दुर्भाग्य की बात यह है कि पहले जिन किसानों से भूमि अर्जित की गई, आज भी वे पुनर्वास और रोजगार के लिए भटक रहे हैं। पुराने नियमों के अनुसार इसके लिए पात्र परिवारों को आज नए नियमों का हवाला देकर रोजगार के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। इस कड़वे अनुभव के कारण अब किसी भी प्रकार के नए अधिग्रहण का भी कड़ा विरोध हो रहा है। कोरबा जिले में सरकार और प्रशासन के साथ आम जनता के टकराव का यह मुख्य बिंदु बन गया है।
रोजगार और पुनर्वास से जुड़ी मांगों को लेकर छत्तीसगढ़ किसान सभा पिछले पांच वर्षों से यहां आंदोलनरत है। इस आंदोलन की संगठित शुरूआत भू-विस्थापित रोजगार एकता संघ के साथ एक संयुक्त धरने से हुई। इस धरने के 1700 दिन पूरे हो चुके हैं। कोयला खनन प्रभावित लोगों की विशाल लामबंदी के साथ कई बार एसईसीएल के कुसमुंडा और गेवरा कार्यालयों का घेराव किया गया, कई बार खदान बंदी की गई, सड़क और रेल जाम करके कोयला परिवहन रोका गया। इस आंदोलन के दबाव के कारण पुनर्वास संबंधी कुछ समस्याओं को और रोजगार के लंबित प्रकरणों को हल करने के लिए एसईसीएल प्रबंधन को मजबूर भी होना पड़ा है। लेकिन यह जीतें आंशिक हैं और मुख्य मांगों पर संघर्ष जारी है।
संघर्ष के इसी क्रम में 15 जून को किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और माकपा सांसद अमराराम के नेतृत्व में कोरबा कलेक्ट्रेट का घेराव करने का निर्णय लिया गया था। इस आंदोलन को विफल करने के लिए प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत लगाई, तो इसे सफल करने के लिए किसान सभा के कार्यकर्ता भी अपने पर्चों और भाजपा सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष के संदेश के साथ गांव-गांव, घर-घर पहुंचे। फलस्वरूप सैकड़ों लोगों ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
भू-विस्थापितों की मांगों को जायज ठहराते हुए कॉमरेड अमराराम ने उनकी आवाज को संसद में उठाने का आश्वासन दिया। महाराष्ट्र और राजस्थान के आदिवासियों और किसानों के आंदोलनों, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और तीन किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ चले देशव्यापी आंदोलन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की व्यापक एकता और सड़कों पर उनका जुझारू आंदोलन ही भाजपा सरकार को भू-विस्थापितों की मांगों को पूरा करने को बाध्य करेगा, अन्यथा तो उन्हें अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेटों की सेवा करने से ही फुर्सत नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि पूरे देश में भाजपा सरकार मां के नाम पर एक पेड़ लगाने का नाटक कर रही है, लेकिन दूसरी ओर बस्तर, सरगुजा और हसदेव के जंगलों को कॉरपोरेटों को सौंप रही है। यह सरकार गरीबों से उनकी भूमि और आजीविका छीन रही है। पिछले 40 साल से भूविस्थापित अपने रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस पीड़ा को संसद में उठाया जाएगा और मोदी सरकार और कोल इंडिया की जवाबदेही तय की जाएगी।
सभा को किसान सभा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव अवधेश कुमार, आदिवासी एकता महासभा के बाल सिंह तथा छत्तीसगढ़ किसान सभा के संयुक्त सचिव प्रशांत झा सहित अन्य नेताओं ने भी संबोधित किया। सभा के बाद रैली निकली और जिलाधीश को ज्ञापन सौंपा गया। रैली और घेराव में हसदेव, सरगुजा संभाग, रायगढ़ के खनन प्रभावित और बांगो बांध से प्रभावित किसान भी शामिल हुए। किसान सभा के राज्य सचिव कपिल पैकरा, कोरबा जिला सचिव दीपक साहू, दामोदर श्याम, रेशम यादव, कौशल्या, फिरतू बिंझवार, दिलहरण सारथी, रामलाल करियारे, बलराम यादव, शिवरतन कंवर, सोनम साहू, रमेश दास, मनोज विश्वकर्मा, घासी आदि ने घेराव का नेतृत्व किया।
विस्थापितों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
1) एसईसीएल द्वारा आज तक अधिग्रहीत भूमि पर, वन टाइम सेटलमेंट कर, सभी लंबित रोजगार प्रकरणों का छह माह के भीतर निराकरण करके प्रभावितों को स्थायी रोजगार दिया जाएं।
2) आज तक के अधिग्रहणों के सभी प्रकरणों में और भविष्य में होने वाले अधिग्रहण में, प्रभावित सभी छोटे खातेदारों (2 एकड़ से कम भूमि वाले) को अनिवार्य रूप से स्थायी रोजगार दिया जाएं।
3) भू-अर्जन के बाद विस्थापित परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चों के रोजगार के दावे स्वीकार करके उन्हें स्थायी रोजगार दिया जाएं।
4) अलग-अलग खातों के संयोजन के कारण रोजगार से वंचित लोगों को चिह्नित करके और उनके दावे स्वीकार करके उन्हें स्थायी रोजगार प्रदान किया जाये। आंशिक अधिग्रहण पर रोक लगाई जाए।
5) कोयला खनन की समाप्ति के बाद पुराने अर्जित भूमि को सुधारकर मूल खातेदारों को वापस किया जाएं।
6) अधिग्रहण के बाद 5 सालों के भीतर जिन जमीनों पर कोल इंडिया ने भौतिक कब्जा नहीं किया है और जिन अधिग्रहित जमीनों पर किसान ही पीढ़ियों से काबिज हैं, ऐसी जमीन मूल भूस्वामी किसान या उसके उत्तराधिकारी को हस्तांतरित की जाएं तथा ऐसी जमीनों का भूस्वामित्व उन्हें प्रदान किया जाएं।
7) अधिग्रहण से प्रभावित भू-विस्थापित किसानों के लिए उनकी सहमति के साथ पुनर्वास स्थल का चयन किया जाएं तथा बुनियादी मानवीय सुविधाओं की उपलब्धता के साथ उनका पुनर्वास किया जाएं। इन स्थलों/ गांवों में पुनर्वासित परिवारों को उनके कब्जे की भूमि के पट्टे दिए जाएं।
8) खनन प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था किया जाए।
9) खनन प्रभावित गांवों एवं पुनर्वास गांव की महिलाओं को स्वरोजगार योजना के तहत रोजगार उपलब्ध कराया जाये।
10) एसईसीएल में आऊट सोर्सिंग से होने वाले कार्यों में भू-विस्थापितों एवं खनन प्रभावित गांवों के सभी बेरोजगारों को रोजगार दिया जाएं। इसके बाद ही अन्य लोगों को रोजगार दिया जाएं।
11) भूमि अधिग्रहण से प्रभावित सभी भू-विस्थापितों को बसावट प्रदान किया जाए। बसावट के नाम पर भेदभाव बंद किया जाए और सभी क्षेत्रों के भू-विस्थापितों को बसावट के लिए एक समान राशि 15 लाख रुपए दिए जाए।
12) डंपिंग की मिट्टी को खोदे गए खदान में वापस भरा जाए। इस मिट्टी का किसी दूसरे कार्यों में प्रयोग ना किया जाए।
13) एसईसीएल कुसमुंडा द्वारा वर्ष 2018 में गेवरा में अधिग्रहीत भूमि के लिए किसानों को तत्काल नवीनतम दरों पर मुआवजा और स्थायी रोजगार आदि दिया जाए; अन्यथा पूर्व में जारी अधिग्रहण रद्द किया जाए।
14) डी-पिल्लरिंग से प्रभावित गांव सुराकछार बस्ती में किसानों को हुये नुकसान का क्षतिपूर्ति मुआवजा प्रदान किया जाये।
15) शासन की योजनाओं से प्राप्त पट्टों एवं शासकीय और वन भूमि पर बने मकानों का भी मुआवजा एवं सौ प्रतिशत सोलिशियम राशि दी जाएं और बसाहट के सभी लाभ उन्हें दिया जाये । 16) बांगों बांध जलाशय में ठेका प्रणाली समाप्त किया जाएं और विस्थापित आदिवासी एवं स्थानीय मछुवारा समितियों को मछली पकड़ने का अधिकार दिया जाए।