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सम्पादकीय: न्यूज़क्लिक: सच्चाई की जीत को तार्किक मुकाम तक पहुंचाना बाकी है

सम्पादकीय: न्यूज़क्लिक: सच्चाई की जीत को तार्किक मुकाम तक पहुंचाना बाकी है

न्यूज़क्लिक और इसके संस्थापक सम्पादक प्रबीर पुरकायस्थ के मामले में हाईकोर्ट का फैसला कई मायने में अहम है : यह हमारे कालखण्ड के सबसे मुखर, साहसी और जनोन्मुखी मीडिया की नैतिक जीत तो है ही,  मोदी राज में स्वतंत्र प्रेस और खबरिया माध्यमों को डराकर, दबाकर, खामोश करने की कायराना मानसिकता के गाल पर तमाचा लगाने वाला  और तानाशाही के खिलाफ लड़ने जूझने वाले छोटे मंझोले मीडिया समूहों व्यक्तियों, संस्थानों के लिए उम्मीद और आशा जगाने वाला भी है। 

न्यूज़क्लिक पर फरवरी 2021 में छापा मारा गया था और 3 अक्टूबर 2023 में इसके प्रमुख सम्पादक प्रबीर पुरकायस्थ सहित कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुरकायस्थ को, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध नहीं ठहरा दिया तब तक,  कुल मिलाकर 226 दिन तिहाड़ जेल में रहना पडा।  न्यूजक्लिक की संपत्ति जब्त होने की वजह से 100 से ज्यादा कर्मचारियों और अपने मैदानी काम से ख्यातनाम हुए पत्रकारों को नौकरी गंवानी पड़ी। दफ्तर पर ताले जड़ने और लैपटॉप सहित सारे उपकरण जब्त करने के चलते एक जीवंत मीडिया की गतिविधियाँ लगभग रोक दी गयीं और उसके करोड़ों दर्शकों तथा पाठकों को सच जानने के मूलभूत अधिकार से वंचित कर दिया।  इतना ही नहीं,  अमरीका के अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक प्रायोजित खबर को आधार बनाकर न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ झूठे आरोपों की जहरीली मुहिम छेड़ दी गयी। उन पर विदेशी धन लेने से लेकर , चीन से सांठगाँठ, अनुचित लेनदेन, गलत हिसाब और मनी लोंऊन्डरिंग तक के आरोप लगाए गए।  सिर्फ मोदी शाह की जुंडली ही चुनिन्दा कहानियां बनाकर लीक नहीं कर रही थी, सत्तापार्टी भाजपा,  आरएसएस और गोदी मीडिया सहित समूचा कार्पोरेटी गिरोह इन बेबुनियाद झूठों को हवा देने में भिड़ा हुआ था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन सभी आरोपों को को सिरे से खारिज कर दिया है। जिस कूटरचित एफआईआर से इस साजिश की शुरुआत हुई थी उसे ही निरस्त करने का फैसला सुनाया है।

29 मई 2026 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए और उसका दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है।व्यक्तिगत स्वतंत्रता, क़ानून के राज और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए न्यायपालिका ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि किसी भी जांच या कार्रवाई को कानून की कसौटी पर खरा उतरना होगा। अदालत ने दोहराया कि न्याय का मूल सिद्धांत है कि कानून सबके लिए है, लेकिन उसका दुरुपयोग किसी के खिलाफ नहीं होना चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफ आई आर  को रद्द करते हुए सख्त टिप्पणी में यह भी कहा कि इस मामले को जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” था।

अदालत ने पाया कि एफ आई आर में लगाए गए आरोपों से न तो धोखाधड़ी का अपराध बनता है और न ही आपराधिक न्याय भंग का ही मामला बनता। जिन विदेशी निवेश , शेयरों के मूल्यांकन तथा निवेश समझौते आदि को लेकर तूमार खडा किया गया था उनके बारे में भी अदालत ने साफ़ साफ़ कहा कि वे अपने-आप में किसी आपराधिक साजिश का प्रमाण नहीं हैं। फैसले में यह भी दर्ज किया गया है कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की प्रतिक्रिया के अनुसार विदेशी निवेश तत्कालीन नियमों और तरीकों से और विधि द्वारा निर्धारित मार्ग से प्राप्त हुआ था। इसमें विदेशी मुद्रा लेनदेन से जुड़े फेमा नियमों का उल्लंघन किया गया इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता। चूंकि प्रवर्तन निदेशालय का सारा मुकद्दमा ही इसी झूठ और कल्पित आरोप पर टिका था इसलिए उसे खारिज होना ही था। ई डी  ने यह भी दावा किया था कि कंपनी ने वेतन, परामर्श शुल्क और किराए पर अत्यधिक खर्च किया तथा विदेशी निवेश की राशि को इन भुगतानों के माध्यम से डायवर्ट किया गया। अदालत ने इस तोहमत को भी स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि डिजिटल मीडिया क्षेत्र में कार्यरत किसी संस्था के लिए कर्मचारियों, सलाहकारों और कार्यालय संचालन पर खर्च होना सामान्य व्यावसायिक गतिविधि का हिस्सा है।

अदालत के फैसले ने जांच एजेंसियों को मीडिया के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की इन दिनों आम बना दी गयी रणनीति को बेनकाब कर दिया है और न्यूज़क्लिक की पत्रकारिता को सही साबित किया है। यह फैसला भले न्यूज़क्लिक के प्रकरण में है, मगर यह फैसला केवल न्यूज़क्लिक तक सीमित नहीं है। यह जांच एजेंसियों की शक्तियों, मीडिया की स्वतंत्रता और आपराधिक कानून के उपयोग की न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। इस लिहाज से यह निर्णय स्वागत योग्य है और इन दिनों न्यायपालिका की जो स्थिति देखने में आ रही है उसके हिसाब से साहसी तथा सराहनीय भी है। मगर असली षडयंत्रकारियों की शिनाख्त के मामले में और अधिक स्पष्टता की दरकार बनी हुई है। जांच एजेंसियों की कार्यशैली की आपराधिकता को यह सही तरीके से चिन्हांकित भी करता है,  उसके लिए उन्हें फटकार भी लगाता है। मगर यह सूत्रधार को बरी करके कठपुतलियों को गुनहगार ठहराने जैसी बात है।  वैसी ही बात है जैसे जान लेने का दोषी बन्दूक और उससे निकली गोली को माना जाए,  जिसने उसे चलाया उसका उल्लेख ही गायब कर दिया जाए।  प्रवर्तन निदेशालय और उसकी जैसी बाकी एजेंसियों को न्यूज़क्लिक को निशाना बनाने का इल्हाम नहीं हुआ था,  उन्हें बाकायदा निर्देश देकर यह आपराधिक काम सौंपा गया था । दुनिया जानती है कि इन दिनों इस तरह की एजेंसियों को पालपोस कर इस तरह से प्रशिक्षित किया गया है कि जब और जिसके खिलाफ इन्हें छू बोला जाए वे बिना अपने विवेक का इस्तेमाल किये उस पर लपक पड़ें।

दिल्ली हाईकोर्ट जिसे संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग,  विधिमान्य प्रक्रियाओं का उल्लंघन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की घोर अवमानना और अवज्ञा मानता है वह काम इन एजेंसियों ने अपने मन से नहीं किया । जिनके कहने पर किया गया उन्हें नामजद किया जाना जाना और दंड का भागी बनाया जाना ही पूरी तरह से न्याय किया जाना होगा। इसके साथ जो भयानक क्षति इस झूठे मुकदमे के चलते व्यक्ति और संस्थान – न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ सहित जेल में रहे बाकी सब- को उठानी पड़ी है उनकी समुचित क्षतिपूर्ति की जानी चाहिए।  प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने अपने  बयान में  सरकार से भविष्य में पत्रकारों और स्वतंत्र प्रेस के ख़िलाफ़ इस प्रकार के निशाना साध कर किये जाने वाले  उत्पीड़न से परहेज़ करने के आग्रह के साथ ही पत्रकारों को हुए नुक़सान का उचित मुआवज़ा देने की मांग ठीक ही उठाई है । उसने  भारतीय प्रेस परिषद से उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्यवाही शुरू करने की अपील भी की है, जिनके इशारे पर न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया गया।

न्यूज़क्लिक से मोदी गिरोह की चिढ़ की वजह इसकी पत्रकारिता के तेवर और उसकी प्रस्तुति के साथ यह भी थी कि जब सारा कारपोरेट मीडिया किसानों के एतिहासिक आन्दोलन के वक़्त उन्हें देशद्रोही और न जाने क्या क्या बताते हुए राजा का बाजा बजा रहा था : तब न्यूज़क्लिक था जिसने किसान आन्दोलन को, जिस कवरेज का वह हक़दार था वह उसे दिया, किसानों के असली मुद्दों को रखा । वस्त्रहीन हुक्मरानों की नग्नता को दुनिया के सामने उजागर किया। यही वजह थी कि देश के किसान आन्दोलन ने न्यूज़क्लिक पर हमले को अपने ऊपर हमला माना था।

पीजेन्ट्स वौइस इस निर्णय को उसके तार्किक मुकाम तक पहूँचाने की आवशयकता को दोहराते हुए इस षडयंत्र के सूत्रधारों का उत्तरदायित्व तय कर उन्हें भी दण्डित करने, क्षति का पूरा मुआवजा देने तथा भविष्य में एजेंसियों का इस तरह का दुरुपयोग सख्ती से बंद करने की मांग करता है।

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