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अखिल भारतीय किसान सभा के 90 वर्ष: संघर्ष, कुर्बानी, उपलब्धियों के इतिहास के कुछ आयाम : एक

(अखिल भारतीय किसान सभा ने अपनी स्थापना के 90वे वर्ष को साल भर मनाने का कार्यक्रम बनाया है । किसान सभा का इतिहास असल में भारत की जनता की सामाजिक बदलाव के लिए की गयी जद्दोजहद का इतिहास है । इस पूरी वर्ष में संघर्ष, कुर्बानी, उपलब्धियों के इतिहास के कुछ आयाम क्रमशः प्रकाशित किये जायेंगे । यह उसकी पहली किश्त है । सम्पादक )
इतिहास सामजिक विकास के क्रमबद्द नियमों नियमों द्वारा निर्देशियत समाज विकास का क्रम होता होता। विशेष उत्पादन प्रणाली का अस्तित्व में आना होता है। इस तरह इतिहास दरअसल उत्पादन के विकास का इतिहास है। विकास के इस क्रम को तोड़ा नहीं जा सकता। उत्पादन विकास अंततः उत्पादन की शक्तियों और उत्पादन के संबंधों के बीच टकराव से होने वाली गति का परिणाम है इसीलिये ; अब तक का – लिखित इतिहास – वर्ग संघर्ष का इतिहास है। भारत में किसान आंदोलन के सबसे संगठित हिस्से अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास भी इन्ही दोनों आधारों पर विकसित हुआ, विकासमान इतिहास है।
भारतीय समाज में कृषि और कृषि संबंध ;
भारत में कृषि काफी पुरानी है। करीब 10 हजार साल पहले तांबे का उपयोग सीख लिया गया था। इससे कृषि और पशुपालन में तेजी से बढ़ोत्तरी हुयी। करीब 7 हजार साल पुरानी हड़प्पा सभ्यता का आधार कृषि और वाणिज्य था।
कोई साढ़े तीन – चार हजार साल पहले (ई.पू. 2000-1500 के बीच) आर्य आये। घुमंतू थे – यहां की जीवन शैली और समाज को प्रभावित किया उन पर भी असर हुआ। वे लोहे का उपयोग – यह लौह-क्रान्ति का युग था। कृषि और पशुपालन आगे बढ़ा। ग्राम समाज का विस्तार हुआ। इस दौरान अनेक बाहरी कबीले भी भारत में आये। आर्य अपने साथ वर्णाश्रम – जिसे उन्होंने बाद में, उत्पादन के विकास की एक ख़ास स्थिति में, सूत्रबध्द किया – लाये थे।
वर्णाश्रम ने भारतीय समाज को खासतौर से प्रभावित किया। यहां दास प्रथा थी किन्तु यूरोप तथा दुनिया के बाकी इलाकों की भांति उत्पादन में उसकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी। यहां श्रम विभाजन मोटे तौर पर वर्णाश्रम के दायरे में हुआ। जैसे जैसे उत्पादन का विकास हुआ वैसे वैसे वर्णाश्रम की कठोरता का भी विकास हुआ – क्योंकि वह दूसरों की मेहनत को हड़पने का एक कारगर और आसान जरिया बन कर सामने आया। सामजिक विकास की क्रमबध्दता पर इसका एक असर यह हुआ कि यहां दास-प्रथा से हासिल सरप्लस की दम पर सामंतवाद नहीं आया।
यहां सामंतवादी उत्पादन प्रणाली की शुरुआत गुप्त युग के बाद पूर्व मध्यकाल (880 से 1200 ईस्वी) में भूदान से हुयी ; वर्णाश्रम के चलते इसका ज्यादातर लाभ उच्च वर्ण की जातियों को ही मिला। इसके सामाजिक असर भी हुए। वर्णाश्रम के दायरे में ही पेशे, संबंध, आव्रजन, निवास आदि इत्यादि के आधार पर जातियों का निर्माण हुआ। इसने उत्पादन के संबंधों के साथ साथ समाज को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित किया।
उत्तर मध्यकाल ; सल्तनत और मुगलों के काल में कृषि का विकास हुआ साथ ही उससे हासिल सरप्लस के आधार पर बड़े पैमाने पर नगरीकरण भी हुआ।
उपनिवेशकालीन भारत
यूं तो विदेशी लुटेरों का आना और पूंजीवादी उत्पादन की भ्रूण 15 वीं शताब्दी में वास्को-डि -गामा के 1498 ईस्वी में कालीकट आने और 1500 में फैक्ट्री बनाने, 1510 में गोवा पर कब्जा करने से हो गया था। मगर असल हमला तब हुआ जब यूरोप को भारत से की जा सकने वाली लूट का अंदाजा हुआ और उन्होंने अनेक ईस्ट इंडिया कंपनी बनाकर इस ओर ध्यान केंद्रित किया। सन 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बनी, 1602 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनी. 1664 में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी बनी। तीनो आये भी किन्तु वास्तविक वर्चस्व और निर्बाध तथा क्रूर शोषण और लूट की शुरुआत 1757 में मुर्शिदाबाद के प्लासी में हुए उस युद्द से हुयी जिसे तिकड़म और धतकरम, बेईमानी और घूसखोरी से अंग्रेजों ने जीत लिया था। कुछ साल बाद बक्सर की लड़ाई (1764) में बंगाल, बिहार, ओड़िसा और 1818 में मराठों को बाँटकट फिर जीतकर पूरा वर्चस्व कायम कर लिया।
यह समाज के विकास के क्रम का व्यतिक्रम था। सामंतो को पराजित कर जो राज कायम हुआ वह यहीं की सामंती व्यवस्था के अंदर से पैदा हुआ पूंजीवादी राज्य नहीं था। हालांकि उसके विकसित होने की स्थिति परिपक्व हो रही थी। यह देशी नहीं विदेशी पूंजीवाद का राज था। इस विदेशी पूंजीवाद ने समाज का स्वाभाविक विकास रोक दिया।
इतिहास की सबसे भयानक लूट
अंगरेजी पूंजी सौदागरी से औद्योगिक होते हुए वित्तीय पूंजी के चरण तक पहुँची। इसने जितनी जबरदस्त और भयानक अमानवीय परिणाम देने वाली लूट की है उसकी मिसाल तब तक के इतिहास में और कोई नहीं मिलती।
उस काल में कार्ल मार्क्स, दादा भाई नौरोजी उनके कुछ बाद रजनी पाम दत्त, डॉ रामविलास शर्मा तथा हाल ही में आये अनेक प्रकाशनों ने इसका व्यवस्थित ब्यौरा प्रस्तुत किया है। यह लूट विनाशकारी थी ; यह लूट सर्वआयामी थी।
सबसे पहले तो इसने उस आर्थिक ढाँचे को ध्वस्त किया जो भारत स्वाभाविक पूंजीवादी विकास की आधारशिला बन सकता था। भारत के कपडे और दस्तकारी, जिसकी धाक दुनिया भर में थी, की कमर ही तोड़ दी। यह काम दो तरह से किया ; भारतीय उत्पादों पर चुंगी बढ़ाकर और अंगरेजी माल को बिना चुंगी लाकर। भारत के रेशम और सिल्क की कीमत मशीनों से बनने वाले अंगरेजी सूती कपडे से आधी से भी कम थी, उस पर और भारत की छींट पर 78 प्रतिशत चुंगी लगा दी गयी। करघे तोड़ दिए गए। कहते हैं कि अंगूठे भी कुचल दिए गए। लोहे, तांबे और पीतल के साथ भी यही हुआ। नतीजा यह निकला कि मुर्शिदाबाद जो सम्पन्नता और आबादी में लन्दन के बराबर था भुतहा हो गया। ढाका की आबादी 1880 में 2 लाख और निर्यात एक करोड़ का था वह 1890 में घटकर आबादी में 79 हजार का और निर्यात में 30 लाख रह गया। सूरत तबाह हो गया। गोरखपुर में 1 लाख 75 हजार 600 महिलायें चरखा कातकर सूत उत्पादन करती थीं – बेरोजगार हो गयीं। पुरानी ग्राम व्यवस्था का आधार कृषि और दस्तकारी था, पूरी तरह टूट गया। मार्क्स लिखते हैं कि “हिन्दुस्तान के मैदानों में जुलाहों की हड्डियां बिखरी हुयी हैं। ” 18 वी सदी में देश में शहरी आबादी करीब 50 प्रतिशत थी जो 19 वी सदी के अंत में घटकर सिर्फ 15 प्रतिशत रह गयी।
कृषि संबंधो में भी विनाशकारी परिवर्तन किये गए। प्रक्रिया ही उलट गयी, सारे दस्तकार खेती की ओर वापस गए जो पहले ही अलाभकारी थी अंगरेजी राज में हुए परिवर्तनों ने और यातना बना दी।
मालगुजारी की दरें भयानक थीं। लगान की दर 1895 में 61% थी जी 1921 में 73% हो गयी। हिन्दुस्तानी शासको ने बंगाल में 1764 में 8 लाख 17 हजार पौंड मालगुजारी वसूली थी – जो कार्नवालिस के आने और इस्तेमारारी बंदोबस्त के बाद 1793 में 34 लाख पौंड तक जा पहुँची। वारेन हेस्टिंग्स की रिपोर्ट बताती है कि 1770 के बंगाल, बिहार, ओडिसा के अकाल में 1 करोड़ लोग मारे गए जो आबादी का एक तिहाई थे। एक तिहाई जमीन जंगल बन गयी जहां जंगली जानवर रहने लगे। इसके बाद भी मालगुजारी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हुयी। कारिंदों की लूट इसके अलावा थी। इसी दौर में यूरोप और आस्ट्रेलिया के लिए नील पैदा करने के नाम पर किसान और खेती दोनों को और बर्बाद किया गया।
मुग़ल काल में किसानो से 1/3 लगान था जो विलायती जमींदारी प्रणाली लाकर अंग्रेजो ने दोगुना कर दिया। नतीजे में किसानो का 80 प्रतिशत हिस्सा कर्ज में डूब गया – चौथाई कर्ज लगान चुकाने के लिए लिया जाने वाला था।
खेत मजदूर की आमदनी पर भी इसका असर पड़ना ही था। यह 1842 में एक आना थी जो 90 साल बाद 1922 में 4 से 6 आना हुयी। यह वृध्दि नकारात्मक थी क्योंकि 1842 में चावल की कीमत 40 सेर प्रति रुपया थी जबकि 1922 में चावल 1 रूपये का पांच सेर था। मतलब 1842 दिन भर की मजदूरी से वह ढाई किलो चावल खरीद सकता था जो 1922 में दिन भर की मजदूरी के बाद सवा किलो रह गया।
मजेदार बात यह थी कि खेती की दुर्दशा और किसानो की मौतें रोकने के लिए अंग्रेज सरकार का रॉयल कमीशन (1926) जो आया और लंबी चौड़ी रिपोर्ट दी उसे दिए गए कामों के बारे में निर्देश था कि “लगान, जमींदारी, मालगुजारी और आबपाशी की मौजूदा व्यवस्था के बारे में किसी तरह का सुझाव पेश करना कमीशन का काम नहीं होगा। “
इस तरह हुयी लूट के बारे में दादा भाई नौरोजी ने 1901 में लिखा था कि “महमूद ग़ज़नवी 18 बार में जितना लूट कर नहीं ले गया था उससे अधिक अंग्रेज एक साल में लूट कर लन्दन ले जाते हैं। ” उनकी बात सही थी ; 1757 से 1815 के बीच ब्रिटिश बैंकों में 1 अरब पौंड भारत से लूटी गयी रकम जमा हुयी थी। मगर ग़ज़नवी के 18 वे हमले के बाद उसके दिए गए घाव भर गए थे – अंग्रेजों की लूट ने बुनियादी शक्तियों का ध्वंस कर दिया था – वे घाव कभी नहीं भर पाए।
इस दौर की मुख्य समस्याओं को रजनी पाम दत्त ने इस तरह सूत्रबध्द किया है ;
(1) जीविका निर्वाह के दूसरे साधन बंद होने से खेती करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गयी। (1891 में 61.1% से 1921 में 73%)
(2) जमीन पर एकाधिकारी प्रथा होने से किसानो पर आर्थिक बोझ बढ़ गया।
(3) खेती करने का ढंग बहुत पिछड़ा था, उसकी उन्नति करने में हजार अड़चनें थीं।
(4) अंगरेजी राज में खेती में ठहराव और ह्रास पैदा हुआ।
(5) किसानो की गरीबी दिनोदिन बढ़ती गयी। जमीन के बाँट छोटे छोटे टुकड़े हुए। किसानो के एक हिस्से से जमीन छिन गयी।
(6) वर्गभेद बढ़ा ; खेतिहर मजदूर 33 से बढ़कर 50 प्रतिशत हो गए।