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जलवायु परिवर्तन और कृषि: कम-विकसित देशों के किसानों के साथ हो रही धोखाधड़ी

जलवायु परिवर्तन और कृषि: कम-विकसित देशों के किसानों के साथ हो रही धोखाधड़ी

यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि मानवीय गतिविधियों — मुख्यतः औद्योगिक उत्पादन, जीवाश्म ईंधन (कच्चा तेल, गैस और कोयला) जलाना और परिवहन — से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें धरती को गर्म कर रही हैं। इन गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जन अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों ने पिछले डेढ़-दो सौ सालों में किया है। इसके कारण हुए जलवायु परिवर्तन की मार आज दुनिया भर के किसान झेल रहे हैं। बाढ़, सूखा, बेमौसम बारिश, तूफान — ये सब अब पहले से कहीं ज़्यादा तीव्र और बार-बार आ रहे हैं। भारत समेत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के करोड़ों किसान इसकी चपेट में हैं। लेकिन इस संकट के लिए ज़िम्मेदार कौन है? और इससे निपटने के लिए जो अंतरराष्ट्रीय वादे हुए, वे कहाँ गए?

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संधि (UNFCCC) 1994 में लागू हुई। इसमें यह सिद्धांत स्वीकार किया गया कि जलवायु परिवर्तन के होने और इससे निपटने की विकसित देशों की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है। इसे “साँझी किन्तु अलग-अलग ज़िम्मेदारी और संबंधित क्षमताएँ” (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities) कहा गया। संधि की पहली और दूसरी धारा में यह स्पष्ट लिखा था कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन से लड़ने में अगुवाई करेंगे और विकासशील देशों की — जो इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं — जरूरतों का भार उठाने की जिम्मेदारी लेंगे। संधि में यह भी तय हुआ कि विकसित देश विकासशील देशों को “नई और अतिरिक्त” वित्तीय सहायता देंगे और पर्यावरण-अनुकूल वैज्ञानिक तकनीकें हस्तांतरित करेंगे। सन् 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल में विकसित देशों ने स्वीकार किया कि वे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन (emission) में 2008-12 तक 1990 के स्तर से 5 प्रतिशत कटौती करेंगे।

वित्तीय वादे: किए गए, पर पूरे नहीं हुए

सन् 2010 में मेक्सिको के कैनकुन में हुए COP16 सम्मेलन में विकसित देशों ने वादा किया कि वे 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर जलवायु वित्त विकासशील देशों को देंगे। 2015 के पेरिस समझौते में यह लक्ष्य स्वीकार करते हुए इसकी समय-सीमा बढ़ाकर 2025 कर दी गई।

लेकिन वास्तविक ज़रूरत इससे कहीं अधिक है। UNFCCC की स्थायी वित्त समिति (Standing Committee on Finance) का अनुमान है कि विकासशील देशों को 2030 तक जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 5.012 से 6.852 ट्रिलियन डॉलर की ज़रूरत है। कुछ अन्य अनुमान 8 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक हैं। यानी जो 100 अरब डॉलर का वादा था, वह भी असली ज़रूरत के सामने बहुत कम था — और यह वादा भी पूरी तरह नहीं निभाया गया।

OECD ने दावा किया है कि विकसित देशों ने 2024 में 100 अरब डॉलर का लक्ष्य पूरा कर लिया। Climate Policy Initiative (CPI) की रिपोर्ट तो और आगे जाकर यह कहती है कि 2023 में दुनिया भर में जलवायु वित्त बढ़कर 1.9 ट्रिलियन डॉलर हो गया, और CPI का अनुमान है कि 2028 तक 6 ट्रिलियन डॉलर के “सबसे रूढ़िवादी” लक्ष्य को भी पूरा किया जा सकता है।

ये दावे भ्रामक हैं और इसे ठीक से समझने की जरूरत है। पहला, विकसित देशों द्वारा दिया गया अधिकांश धन अनुदान नहीं बल्कि कर्ज़ है। सन् 2019-20 में विकसित देशों द्वारा दिए गए $83.4 अरब में से केवल $24.5 अरब ही अनुदान के रूप में थे। शेष कर्ज़ था, जिससे गरीब देशों पर कर्ज़ का बोझ और बढ़ा गया और जिसके कारण कई देश वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। दूसरा, संधि में “नई और अतिरिक्त” वित्तीय सहायता का वादा था, लेकिन पहले से चल रहे विकास-सहायता के पैसों को “जलवायु वित्त” का नया लेबल लगाकर पेश किया जा रहा है। OXFAM के अनुसार इस से जलवायु परिवर्तन के लिये दी गयी वित्तीय सहायता को लगभग 30 प्रतिशत ज्यादा बढ़ा कर दिखाया गया है।

CPI के $1.9 ट्रिलियन के आँकड़ों के पीछे और भी बड़ी जालसाज़ी है। इनमें विकसित देशों और चीन के निजी और घरेलू निवेश — जैसे पश्चिमी यूरोप में घरेलू सौर पैनल, इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ और अन्य बिजली के उपकरणों के उत्पादन में निजी कम्पनियों के निवेश — को भी शामिल कर लिया गया है। यह राशि विकासशील देशों तक पहुँचती ही नहीं। इस भ्रामक तरीके से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये विकसित देशों द्वारा किये जा रहे वित्तीय निवेश के आँकड़ों को बढ़ाया गया है।

यह भी गौरतलब है कि जो वित्तीय संसाधन दिये भी जा रहे हैं, उसका बड़ा हिस्सा ग्रीनहाउस गैसों के उत्पादन में कमी के लिये है, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये नहीं। इसके पीछे एक बुनियादी असमानता है: ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए दिया गया पैसा विकसित और कम-विकसित देशों दोनों को फायदा पहुँचाता है, जबकि कम-विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दिया गया पैसा केवल कम-विकसित देशों को फायदा देता है। यही कारण है कि विकसित देशों की जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए धन देने में रुचि नहीं है। विकसित देशों द्वारा UNFCCC को दी गई द्विवार्षिक रिपोर्टों के अनुसार (OECD, 2024), कुल जलवायु परिवर्तन के लिये वित्तीय संसाधनों का 64 प्रतिशत से अधिक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिये था उसके प्रभावों से निपटने के लिये नहीं।

जलवायु-परिवर्तन से निपटने की चुनौती को सबसे बड़ा झटका ट्रम्प सरकार के पेरिस समझौते से पल्ला झाड़ लेने से लगा है। ट्रम्प सरकार ने जलवायु-परिवर्तन को ही नकार दिया है, और इसके लिये न केवल कोई भी जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है, दुनिया भर में वित्तीय संकट करवाने, युद्ध और तेल व्यापार से मुनाफ़ाखोरी में लिप्त ट्रम्प सरकार के कारनामों से जलवायु-परिवर्तन की समस्या का गम्भीर होना तय है।

जलवायु परिवर्तन और कृषि: असमान मार

IPCC (जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल) के तीसरे मूल्यांकन प्रतिवेदन ने पहली बार यह रेखांकित किया था कि जलवायु परिवर्तन का असर भूगौलिक अक्षांश के अनुसार अलग-अलग होगा। चौथे मूल्यांकन प्रतिवेदन ने इसे और स्पष्ट किया: मध्यम और उच्च अक्षांशों (यानी यूरोप, उत्तरी अमेरिका) में स्थानीय तापमान में 1 से 3 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होने पर फसल उत्पादकता बढ़ सकती है — हालाँकि उससे अधिक वृद्धि पर गिरावट आएगी। लेकिन निम्न अक्षांशों (एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का ज्यादातर हिस्सा), जो धरती के ज्यादा गर्म इलाके हैं, उनमें मात्र 1 से 2 डिग्री की वृद्धि पर भी फसल उत्पादकता में गिरावट होगी और भुखमरी का खतरा बढ़ेगा।

चूँकि अधिकांश कम-विकसित देश इन गर्म क्षेत्रों में हैं, इन देशों की कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर असमान रूप से अधिक पड़ेगा। तापमान वृद्धि के अलावा, मौसमी परिवर्तनों और बाढ़, सूखा, तूफान जैसी अपदाओं के कारण गरीब देशों की खेती को ज्यादा नुकसान होगा। कम-विकसित देशों के किसान और खेत मज़दूर पहले से ग़रीब हैं और इसलिए बदलते जलवायु से निपटने की उनकी क्षमता सीमित है। इन्हीं कारणों से कृषि के अनुकूलन को विकसित देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं का केंद्रीय हिस्सा होना चाहिए था।

जलवायु परिवर्तन के लिये कृषि की ज़िम्मेदारी — बदलते आँकड़ों की कहानी

पिछले दो दशकों में अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में कृषि से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के अनुमान लगातार बढ़ाए गए हैं। इन आँकड़ों की जालसाजी को भी समझना ज़रूरी है।

कृषि से उत्सर्जन मुख्यतः मीथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के रूप में होता है। कृषि से CO₂ का उत्सर्जन नहीं होता है क्योंकि प्रकाशसंश्लेषण (photosynthesis) CO₂ को अवशोषित करता है। इन विभिन्न गैसों के जलवायु परिवर्तन पर असर को मापने के लिये सभी गैसों को CO₂-समतुल्य वज़न (गीगा टन) में मापा जाता है।

IPCC के चौथे मूल्यांकन (AR4, 2007) में पहली बार कृषि क्षेत्र का विस्तृत आकलन किया गया। इसमें 2005 के आँकड़ों के आधार पर कृषि को कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 10-12 प्रतिशत बताया गया। खेती से होने वाले कुल उत्सर्जन में से 38 प्रतिशत मिट्टी से N₂O के उत्सर्जन, 32 प्रतिशत पशुओं के एन्टेरिक फर्मेंटेशन से, 12 प्रतिशत पराली इत्यादि के जलाने से, 11 प्रतिशत धान की खेती से और 7 प्रतिशत खाद के उपयोग से आँका गया। इसके अलावा, वनों की कटाई और भूमि-उपयोग में बदलाव से उत्सर्जन का अनुमान 5.8 गीगाटन था जो कुल उत्सर्जन का लगभग 27 प्रतिशत था।

IPCC के पाँचवें मूल्यांकन (AR5, 2014) में कृषि, वानिकी और अन्य भूमि-उपयोग (AFOLU) का संयुक्त अनुमान प्रस्तुत किया गया। इन आँकड़ों के हिसाब से कृषि का अनुमान 5.0-5.8 गीगाटन और वानिकी/भूमि-उपयोग का 4.3-5.5 गीगाटन था। ऊर्जा क्षेत्र के उत्सर्जन में तेज़ वृद्धि के कारण AFOLU का कुल हिस्सा घटकर 24 प्रतिशत रह गया।

2019 की IPCC की विशेष रिपोर्ट (Climate Change and Land) के अनुमानों के हिसाब से 2007-2016 की अवधि के लिए कृषि, वानिकी और अन्य भूमि-उपयोग से उत्सर्जन 12.0 ± 2.9 गीगाटन प्रति वर्ष (कुल उत्सर्जन का 23 प्रतिशत) था।

IPCC के छठे मूल्यांकन (AR6, 2022) में AFOLU से उत्सर्जन के अनुमान को बढ़ा कर 13 गीगाटन (2019) कर दिया गया। रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि 1990-2019 के बीच औसतन AFOLU उत्सर्जन का 91 प्रतिशत कृषि से आया।

लेकिन AR6 में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव और हुआ — पहली बार “खाद्य तंत्र ” (food systems) की अवधारणा अपनाई गई, जिसमें कृषि से परे — अपशिष्ट, ऊर्जा और उद्योग क्षेत्रों के एक हिस्से को भी शामिल किया गया। इस विस्तारित परिभाषा के अनुसार खाद्य तंत्र से उत्सर्जन 1990 में 14.5 गीगाटन से बढ़कर 2018 में 16.8 गीगाटन हो गया, और कुल उत्सर्जन में इनका हिस्सा 1990 के 20 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 29 प्रतिशत हो गया।

इसके बाद FAO ने भी “एग्रीफूड सेक्टर” की एक और विस्तृत परिभाषा अपनाई, जिसमें कृषि आदानों के उत्पादन और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को भी जोड़ा। इस हिसाब से 2019 में एग्रीफूड सेक्टर का उत्सर्जन 16.5 गीगाटन CO₂-समतुल्य और कुल उत्सर्जन का 31 प्रतिशत आँका गया।

उत्सर्जन अनुमानों की यह क्रमिक वृद्धि तीन कारणों से हुई:

  1. ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) में संशोधन: IPCC अपनी हर रिपोर्ट में मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड के GWP — यानी CO₂ की तुलना में उनकी ऊष्मा-अवशोषण क्षमता का मान — संशोधित करता रहा है। AR1 में मीथेन का 100 वर्षीय GWP 21 था, जो AR4 में 25 और AR5/AR6 में 28 हो गया। नाइट्रस ऑक्साइड का AR1 में 100 वर्षीय GWP 290 था, जो AR4 में 298 और AR6 में 273 हो गया। चूँकि कृषि से उत्सर्जन मुख्यतः इन्हीं दो गैसों के रूप में होता है, GWP में वृद्धि से कृषि के अनुमानित उत्सर्जन स्वतः बढ़ जाते हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू यह है कि मीथेन वायुमंडल में जल्दी नष्ट हो जाती है, जबकि CO₂ सैकड़ों-हज़ारों साल तक बनी रहती है। इसलिए मीथेन का 20-वर्षीय GWP बहुत अधिक होता है, लेकिन 500 वर्षीय GWP बहुत कम। 100 वर्षों का मानक अपनाना एक मनमाना निर्णय है, जिसके लिए कोई वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक आधार नहीं है।

  • विकासशील देशों के उत्सर्जन अनुमानों में बेतुकी वृद्धि: US-EPA ने 2012 में अपने 2006 के अनुमान संशोधित किए। इन संशोधनों में विकासशील देशों के लिए “अन्य स्रोतों” के अनुमान खासतौर पर बड़े पैमाने पर बढ़ाए गए, लेकिन रिपोर्ट में इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
  • परिभाषा का विस्तार: AR6 और FAO ने कृषि की परिभाषा में उर्वरक कारखानों और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं के उत्सर्जन को भी जोड़ दिया। यह तर्कसंगत नहीं है। यदि उर्वरक उत्पादन का उत्सर्जन कृषि के खाते में डाला जाए, तो औद्योगिक श्रमिकों के भोजन के लिए उगाई जाने वाली फसल का उत्सर्जन उद्योग के खाते में क्यों नहीं? इसके अलावा, औद्योगिक अकुशलता (यानी उर्वरक उत्पादन में ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसें निकलना) का बोझ भी कृषि के सिर पर आ जाता है, जबकि यह समस्या उद्योग क्षेत्र की है।

इन सब बदलावों का नतीजा यह है कि ग्रीन-हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन मे अफ्रीका, दक्षिण एशिया और पूर्व एशिया में खाद्य उत्पादन का हिस्सा बढ़ता दिखाया जाता है, जबकि उत्तरी अमेरिका, यूरोप और ओशिनिया के विकसित देशों का हिस्सा कम आँका जाता है। यह उल्लेखनीय है कि AR6 ने यह भी नोट किया कि AFOLU क्षेत्र में CO₂ उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा कम-विकसित देशों के वन-क्षेत्रों में निर्यात-उन्मुख कृषि के विस्तार के कारण जंगलों की कटाई से आ रहा है जिसके तार सीधे विश्व में विकास की नवउदारवादी अवधारणा से जुड़े हैं।

इसके साथ ही खेती से ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन में कितनी कटौती की जा सकती है इसको भी बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है। AR5 ने अनुमान लगाया था कि कृषि क्षेत्र में 7.18 से 10.60 गीगाटन प्रति वर्ष की उत्सर्जन कटौती $100 प्रति टन से कम लागत पर संभव है। AR6 ने इस अनुमान को और बढ़ाकर 8 से 14 गीगाटन प्रति वर्ष कर दिया — जो कि AFOLU क्षेत्र के कुल उत्सर्जन के बराबर है। यानी दावा किया जा रहा है कि कृषि कुछ ही वर्षों में “नेट ज़ीरो” उत्सर्जन प्राप्त कर सकती है।

यह पूरी तरह अव्यावहारिक है, और सिर्फ इसलिए नहीं कि इसके लिए ज़रूरी जलवायु वित्त कहीं नज़र नहीं आता, बल्कि इसलिए भी कि, बिना खाद्य असुरक्षा बढ़ाए ऐसा कर पाने के लिये तकनीकी समाधान अभी उपलब्ध ही नहीं हैं। उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन उर्वरक और जैविक खाद दोनों ग्रीनहाउस गैसों के स्रोत हैं। उर्वरक के उपयोग में कमी किए बिना या उसे समाप्त किए बिना पर्याप्त मात्रा में भोजन उत्पादन कैसे होगा? खेती में रसायनिक खाद के उपयोग को और वैज्ञानिक बनाने से उसकी उत्पादकता बढ़ सकती है लेकिन नाइट्रोजन उर्वरक या जैविक खाद को पूरी तरह छोड़ना और खाद्य सुरक्षा बनाए रखना एक साथ संभव नहीं है। इसी तरह से, यदि एन्टेरिक फर्मेंटेशन से उत्सर्जन कम करने के लिए पशुपालन में कमी की जाए तो न केवल छोटे किसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा पर दुनिया भर में प्रोटीन की आपूर्ति पर भी सीधा असर पड़ेगा। “जलवायु-स्मार्ट कृषि” जैसे शब्द बार-बार प्रयोग किये जाते हैं लेकिन इनके पीछे कोई ठोस तकनीकी समाधान या आर्थिक नक्शा नहीं है। अभी तक इसका कोई ठोस उत्तर नहीं है कि किसान पोषक तत्वों और जैविक खाद का उपयोग घटाते हुए भूमि और जल उत्पादकता कैसे बढ़ाएँगे।

समस्या का सार और चुनौती

इस पूरी समीक्षा से एक चिंताजनक चित्र उभरता है। अंतर्राष्ट्रीय मूल्यांकनों में कम-विकसित देशों की कृषि और खाद्य तंत्र से होने वाले ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन के अनुमान क्रमशः बढ़ाए गए हैं। साथ ही, कृषि में उत्सर्जन कटौती की क्षमता को बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया है और इसमें कम-विकसित देशों में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने का ध्यान नहीं रखा गया है।

विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने का बोझ कम-विकसित देशों — और उसके किसानों पर — डालना चाहते हैं, जबकि वे खुद विकासशील देशों को संसाधन और तकनीक देने की अपनी प्रतिबद्धताएँ पूरी नहीं कर रहे। जलवायु-परिवर्तन से निपटने की चुनौती को सबसे बड़ा झटका ट्रम्प सरकार के पेरिस समझौते से पल्ला झाड़ लेने से लगा है। ट्रम्प सरकार ने जलवायु-परिवर्तन को ही नकार दिया है, और इसके लिये न केवल कोई भी जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है, दुनिया भर में वित्तीय संकट करवाने, युद्ध और तेल व्यापार से मुनाफ़ाखोरी में लिप्त ट्रम्प सरकार के कारनामों से जलवायु-परिवर्तन की समस्या का गम्भीर होना तय है।

दूसरी तरफ, असली चुनौती — कम-विकसित देशों की कृषि और किसानों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये तैयार करना — वैश्विक एजेंडे में पीछे धकेली जा रही है। बदलती जलवायु और बढ़ती आपदाओं से निपटने के लिए किसानों को जो संसाधन और तकनीकी समाधान चाहिए, वे कहीं नज़र नहीं आते। ट्रम्प सरकार ने तो जलवायु-परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है। इससे यह चुनौती और गंभीर हो जाने वाली है। यह मुद्दा भारत जैसे कम विकसित देशों, जिनमें जनसंख्या का अधिकाँश हिस्सा खेती पर आधारित है, के लिये बहुत गम्भीर है और किसान आँदोलन को इस नयी चुनौती से जूझने के लिये तैयार होने की जरूरत है।

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