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महाराष्ट्र में कर्ज माफी: धोखाधड़ी की नयी खेप
सत्ता में आने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों से कर्जमाफी का वादा किया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद वे ‘कर्जमाफी करेंगे, लेकिन तारीख नहीं बताएंगे’ वाले रवैये पर चल पड़े। विभिन्न किसान संगठनों और किसान सभा ने उनके इस चुनाव-केंद्रित टालमटोल के खिलाफ पूरे महाराष्ट्र में जोरदार आंदोलन किए। इसके चलते सरकार को किसान नेताओं के साथ चर्चा करनी पड़ी।
फिर टालमटोल
किसानों के दबाव और आंदोलनों को देखते हुए सरकार ने आखिरकार 30 जून 2026 तक कर्जमाफी लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसके लिए बजट में प्रावधान भी किया गया। लेकिन जब वास्तव में कर्जमाफी देने का समय आया, तब आचार संहिता का बहाना आगे कर दिया गया। किसान सभा और विभिन्न किसान संगठनों ने इस मुद्दे पर फिर से दबाव बनाया, जिसके बाद सरकार ने कहा कि चुनाव आयोग से विशेष अनुमति लेकर कर्जमाफी लागू की जाएगी। अंततः 2 जुलाई 2026 को मंत्रिमंडल की बैठक में इसके अनुसार निर्णय लिया गया।
इस प्रकार किसानों के संघर्ष से हासिल हुई यह महाराष्ट्र की तीसरी कर्जमाफी बनी। इससे पहले 2017 में 1 से 11 जून तक की 11 दिनों की किसान हड़ताल की पृष्ठभूमि में तथा 2019 में लॉन्ग मार्च और किसान आंदोलनों के दबाव में कर्जमाफी की गई थी। अब 2026 में फिर एक नई कर्जमाफी की घोषणा की गई है।
आचार संहिता की आड़
हालांकि कर्जमाफी का निर्णय हो चुका था, फिर भी राज्य की सत्ताधारी शक्तियों ने यह रुख अपनाया कि आचार संहिता लागू होने के कारण वे इसकी घोषणा नहीं करेंगे। लेकिन आचार संहिता का यह कारण वास्तविक नहीं था। कर्जमाफी की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी और इसके लिए बजट में वित्तीय प्रावधान भी किया गया था। यदि कोई योजना नई हो, तभी आचार संहिता की बाधा आती है। यह कोई नई योजना नहीं थी।
असलियत यह थी कि इस योजना में पिछली दोनों कर्जमाफियों की तुलना में कहीं अधिक कठोर शर्तें रखी गई थीं। यदि इसकी घोषणा की जाती, तो यह सच्चाई सामने आ जाती और व्यापक असंतोष पैदा होता। इसलिए बिना औपचारिक घोषणा के ही इसे लागू किया जाने लगा।
शर्तों का जाल
इस बार कर्जमाफी के लिए और भी कठोर शर्तें लगाई गई हैं। 2019 की कर्जमाफी योजना का लाभ लेने वाले तथा पुनः ऋण बकाया होने के कारण इस बार भी पात्र बनने वाले लगभग 12 लाख 71 हजार किसानों को 2 लाख रुपये तक की कर्जमाफी देने के बजाय केवल 50 हजार रुपये की कर्जमाफी देने का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि यदि उनका बकाया ऋण 50 हजार रुपये से अधिक है, तो पहले उन्हें अतिरिक्त राशि स्वयं चुकानी होगी, तभी वे इस लाभ के पात्र होंगे।
2019 के बाद अब तक खरीफ के 7 मौसम बीत चुके हैं। इनमें 2019 में अतिवृष्टि और बाढ़, 2020 में अतिवृष्टि, कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और फसलों की बर्बादी, जुलाई 2021 की भीषण बाढ़ जिसमें 2 लाख हेक्टेयर से अधिक फसलें नष्ट हुईं, 2022 में अतिवृष्टि और बाढ़ से विशेष रूप से मराठवाड़ा और विदर्भ में भारी नुकसान, 2023 में लगातार बारिश, कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी और सूखे जैसी स्थिति, 2024 में अतिवृष्टि और बाढ़जनित नुकसान तथा 2025 में अतिवृष्टि से लाखों हेक्टेयर फसलों का विनाश। इस प्रकार 2019 के बाद के सभी 7 में से 7 खरीफ मौसमों में महाराष्ट्र के किसानों को प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा।
यद्यपि हर वर्ष आपदा की तीव्रता और प्रभावित क्षेत्र अलग-अलग रहे, फिर भी पूरे राज्य के बड़ी संख्या में किसान इस दौरान प्रभावित हुए। 2025 में तो आई भयंकर प्राकृतिक आपदा ने किसानों को लगभग तबाह कर दिया। अतिवृष्टि के कारण कपास, सोयाबीन सहित सभी खरीफ फसलें बह गईं। पशुधन और गोशालाएँ बह गईं तथा खेती की जमीन भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।
कर्जमाफी के सरकारी आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह कर्जमाफी प्राकृतिक आपदाओं के कारण दी जा रही है। तब यह प्रश्न उठता है कि 2019 के बाद आई इन प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव क्या उन किसानों पर नहीं पड़ा था, जिन्हें 2019 में कर्जमाफी मिली थी? यही सवाल अब सामने आ रहा है।
नियमित ऋण चुकाने वाले किसान
अब तक की सभी ऋणमाफी योजनाओं में नियमित रूप से ऋण चुकाने वाले किसानों को केवल प्रोत्साहन अनुदान देकर टाल दिया गया है। इस बार भी लगभग 23 लाख 63 हजार किसानों को केवल 50 हजार रुपये के प्रोत्साहन अनुदान तक सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा, इस प्रोत्साहन अनुदान के लिए पहले की तुलना में अधिक कठोर शर्तें लगाई गई हैं। इन किसानों ने वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 की अवधि में कम से कम दो वर्षों का ऋण चुकाया होना चाहिए।
साथ ही, वर्ष 2025-26 और 2026-27 के ऋण भी उन्होंने चुकाए होने चाहिए, तभी उन्हें यह 50 हजार रुपये मिलेंगे। पिछली ऋणमाफी योजना में, यदि किसान ने ऋणमाफी वाले वर्ष में केवल एक बार भी ऋण चुकाया था, तो वह “नियमित ऋणदाता” के रूप में 50 हजार रुपये के लिए पात्र था। लेकिन इस बार इसके लिए कम से कम चार बार ऋण चुकाने की शर्त रखी गई है।
वास्तव में ये किसान भी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसान ही हैं। कई बार गन्ने के भुगतान या अन्य स्रोतों से सीधे ऋण की कटौती कर ली जाती है, या फिर भविष्य में पुनः ऋण प्राप्त करने और ब्याज माफी का लाभ लेने के लिए उन्होंने कठिन परिस्थितियों में ऋण चुकाया है। ऐसे किसानों को “सक्षम” मानना पूरी तरह गलत है।
.सहकारिता क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा गया
सहकारिता क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं होती। चीनी मिलों के श्रमिकों को कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलता। उन्हें भी 25 हजार रुपये वेतन पाने वाला बताकर ऋणमाफी से वंचित कर दिया गया है।
मौसमी चीनी मिल श्रमिकों के साथ-साथ कृषि उपज मंडी समितियों, सहकारी धागा फेक्टरियों, शहरी सहकारी बैंकों, जिला बैंकों और दुग्ध संघों में कार्यरत कर्मचारियों को भी ऋणमाफी योजना से बाहर रखा गया है।
लोकतंत्र का अवमूल्यन
मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ जिला परिषद, पंचायत समिति तथा अन्य स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी ऋणमाफी से बाहर कर दिया गया है। आरक्षण व्यवस्था के कारण कई बार अत्यंत गरीब दलित, आदिवासी और ओबीसी परिवारों के लोग स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में निर्वाचित होते हैं।
इन सभी प्रतिनिधियों को “सक्षम” मान लेना और उन्हें बिना किसी भेदभाव के ऋणमाफी से वंचित कर देना यह दर्शाता है कि लोकतंत्र के प्रति हमारी सोच कितनी दिवालिया हो चुकी है। धनी जनप्रतिनिधियों को ऋणमाफी न दी जाए, यह उचित हो सकता है, लेकिन अत्यंत गरीब परिवारों से निर्वाचित प्रतिनिधियों को लगातार ऋणमाफी से वंचित करना अन्यायपूर्ण है। संबंधित लोगों को इसके खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
बड़े–बड़े दावे
नई ऋणमाफी योजना के बारे में दावा किया जा रहा है कि सरकार 56 लाख किसानों को इसका लाभ देगी और इसके लिए 36 हजार करोड़ रुपये खर्च करेगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि 2019 की ऋणमाफी योजना, जिसमें अपेक्षाकृत कम शर्तें थीं, उसके अंतर्गत केवल 32 लाख 37 हजार किसानों को लाभ मिला था और उस पर 20,497 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसी प्रकार, 2017 की ऋणमाफी योजना में लगभग 44 लाख 4 हजार किसानों को लाभ मिला था और उस पर केवल 18,500 करोड़ रुपये का खर्च आया था। इन दोनों योजनाओं की तुलना में अधिक कठोर शर्तें होने के बावजूद नई योजना में लाभार्थी किसानों की संख्या बढ़कर 56 लाख और खर्च बढ़कर 36 हजार करोड़ रुपये हो जाएगा, यह दावा तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
नई धोखाधड़ी
नई शर्तों और दावों को देखते हुए यह ऋणमाफी एक नई “धोखाधड़ी” साबित होने की संभावना अधिक है। किसानों का संपूर्ण ऋण रिकॉर्ड (सातबारा) साफ करने के अपने वादे से सरकार स्पष्ट रूप से पीछे हट रही है। वह आचार संहिता का बहाना बना रही है और झूठे दावे करके अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रही है।
लेकिन यह धोखा अधिक समय तक नहीं चलेगा। किसान सभा और अन्य कई किसान संगठन इस मुद्दे पर सड़कों पर उतर चुके हैं। अनेक स्थानों पर सरकारी आदेशों की प्रतियां जलना शुरू हो गया है। किसानों का सातबारा साफ करने का वादा करके उनके वोटों से सत्ता में आई सरकार से जवाब मांगने के लिए किसान अब तैयार हो चुके हैं।